उत्तर प्रदेश

यूपी की तस्वीर साफ: भाजपा के पास भागे रास्ता नहीं !

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कांग्रेस को गठबंधन से रखा गया बाहर, चुनाव तैयारियों में जुटे राजनीतिक दल

लखनऊ । लोकसभा चुनाव के लिये समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी का प्रस्तावित गठबन्धन उत्तर प्रदेश में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के लिये चुनौती का सबब बन सकता है। समाजवादी पार्टी (सपा) के अध्यक्ष अखिलेश यादव और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) अध्यक्ष मायावती की शुक्रवार को दिल्ली में हुई मुलाकात के बाद तय माना जा रहा है कि दोनों पार्टियों में चुनावी गठबन्धन हो गया है।

अब इसकी औपचारिक घोषणा ही बाकी है। 37-37 सीटों पर बनी दलों की रजामंदी दोनों दलों के बीच 37-37 सीटों पर चुनाव लड़ने की सहमति बनी है। शेष छह सीटों में से दो अमेठी और रायबरेली कांग्रेस के लिये छोड़ी जायेगी, जबकि अन्य पर राष्ट्रीय लोकदल उम्मीदवारों को समर्थन दिया जा सकता ​है। उत्तर प्रदेश में लोकसभा की कुल 80 सीटें हैं। इस गठबन्धन के बाद भाजपा को राज्य में कठिन चुनौती मिल सकती है, हालांकि भाजपा नेताओं का साफ कहना है कि उन पर इसका कोई फर्क नहीं पड़ेगा। क्योंकि भाजपा के पास नरेन्द्र मोदी के रूप में करिश्माई व्यक्तित्व है। पीएम मोदी ने देश को नई ऊंचाइयां दी हैं। देश का मान बढ़ाया है। खामियाजा भुगतना पड़ेगा गठबन्धन को पिछड़े, दलित और मुसलमान मतदाताओं पर भरोसा है। जबकि भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता मनीष शुक्ला कहते हैं कि केन्द्र सरकार के काम के आगे जातिवादी राजनीति करने वाले दल एक पल भी नहीं टिक पायेंगे।

सपा के वरिष्ठ नेता और विधायक सुनील यादव ने कहा कि भाजपा शासन से आम जनता ऊब चुकी है। खासतौर पर दलितों, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों से सौतेला व्यवहार किया जा रहा है। इसका खमियाजा भाजपा को भुगतना पड़ेगा। कांग्रेस लड़ेगी तो कटेंगे भाजपा के वोट कांग्रेस को गठबन्धन से बाहर रखा गया है। राजनीतिक प्रेक्षक इसे भी विपक्ष की रणनीति मान रहे हैं। राजनीतिक मामलों के जानकार राजेन्द्र प्रताप कहते हैं कि कोई कुछ भी कहे, लेकिन वे मानते हैं कि कांग्रेस को एक रणनीति के तहत अलग रखा जा रहा है।

कांग्रेस और भाजपा को ज्यादातर अगड़े मतदाता समर्थन देते हैं। कांग्रेस अलग लड़ेगी तो भाजपा के ही वोट कटेंगे। इसका फायदा गठबन्धन को होगा। अमित शाह बने सारथी परिवहन मंत्री स्वतंत्र देव सिंह ने कहा कि सपा, बसपा ही नहीं, सभी लोग एक साथ जुड़ जाएं तो भी वे भाजपा का कुछ नहीं कर पायेंगे। क्योंकि जिस रथ पर योगी और मोदी जैसे यशस्वी नेता विराजमान हो और जिनको हनुमान जैसे कार्यकर्ताओं का आशीर्वाद है। अमित शाह जैसे सारथी रथ को हांक रहे हैं, उसको हराने वाला कोई नहीं है। चुनाव होंगे दिलचस्प भाजपा प्रदेश प्रवक्ता ने कहा कि मोदी के काम सब पर भरी पड़ेंगे। दलितों के आदर्श डॉ. भीमराव आंबेडकर से जुड़े पांच स्थलों को पंचतीर्थ घोषित कर उनका विकास किया। मोदी सरकार ने दलितों के सम्मान में बहुत काम किये हैं, जबकि अन्य दलों ने सिर्फ उनका वोट बटोरा है। यही बात पिछड़ों के लिये भी लागू होती है। पिछड़ों के हितैषी होने का दावा करने वालों ने सिर्फ अपने परिवार को ही आगे बढ़ाया। बहरहाल, राजेन्द्र की माने तो गठबन्धन हुआ तो भाजपा को कठिन चुनौती का सामना करना पड़ेगा। शिवपाल और राजाभैया की पार्टी यद्यपि गठबन्धन को नुकसान पहुंचाएंगी, लेकिन यह नुकसान कितना होगा इसका अभी से आंकलन लगाया जाना मुश्किल है। कैराना ले आया दोनों को नजदीक वर्ष 2014 में भाजपा और उसके सहयोगी अपना दल को 73 सीटें हासिल हुई थी। दो पर कांग्रेस तथा पांच पर सपा जीती थी। बसपा को एक भी सीट नहीं मिली थी। कांग्रेस अमेठी और रायबरेली में ही जीत पायी थी।

सपा और बसपा लोकसभा के गोरखपुर, फूलपुर सीटों पर हुये उपचुनाव में नजदीक आ गये थे। बसपा के समर्थन से दोनों पर सपा जीती थी। बाद में कैराना में सपा और बसपा के समर्थन से रालोद की जीत से वह भी इन दोनों के नजदीक आ गये। इस तरह बनी थी सरकार लोकसभा का आगामी चुनाव सपा, बसपा और रालोद के अस्तित्व से भी जोड़कर देखा जाने लगा है। गठबन्धन की स्थिति में भाजपा को ठोस रणनीति बनानी होगी।

साल 1993 के विधानसभा चुनाव में राम मंदिर का मामला उरेज पर था, लेकिन मुलायम सिंह यादव और कांशीराम के एक साथ आ जाने पर भाजपा सरकार नहीं बना पाई और सपा-बसपा की सरकार बनी थी। यह अलग बात है कि मुलायम सिंह यादव के ​नेतृत्व में बनी सरकार मात्र डेढ़ साल में गिर गयी थी। भाजपा के समर्थन से बसपा ने जून 1995 में सरकार बनायी और मायावती मुख्यमंत्री बनी। कुछ भी हो राजनीतिक प्रेक्षक मान कर चल रहे हैं कि गठबन्धन सफल हुआ तो 2014 की तरह भाजपा के सामने वाकओवर की स्थिति नहीं रहेगी। चुनाव रोचक और दिलचस्प होंगे।

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