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रहने दीजिए ये लॉक डाउन…कश्मीर की आम जनता है हमारे ही कलेजे का टुकड़ा

कश्मीर में लॉक डाउन है, तो इससे इतनी परेशानी क्यूं? क्या पहली बार लोग घरों में कैद हैं वहां? जब बुरहान वानी का एनकाउंटर हुआ था तब लॉक लाउन किसने करवाया था? तब कश्मीरियों को महीनों अपने घरों में बंद रखने वाला कौन था? तब ये लॉक डाउन भारत सरकार या फिर सुरक्षा बलों ने तो नही करवाया था? तब किसी बुद्धिजीवी ने डकार क्यूं नही ली? तब किसी स्वनाम धन्य बड़े पत्रकार की आत्मा ICU में क्यूं नही गई? तब क्या कश्मीरियों की तकलीफ, तकलीफ नही थी। मगर तब तो बुरहान वानी के एनकाउंटर पर आंसू बहाए जा रहे थे! अखबारों में संपादकीय रंगे जा रहे थे! एक दहशतगर्द के एनकाउंटर को अमन और चैन की मौत बताया जा रहा था!

जब कश्मीर में अमरनाथ श्राइन बोर्ड को 99 एकड़ जमीन देने का फैसला हुआ था तो उसके खिलाफ महीनों कश्मीर किसने बंद करवाया था? क्या सुरक्षा बल आए थे बंद करवाने? तब घरों के भीतर कैद हुए कश्मीरियों का दर्द, दर्द नही था।

जब हर जुमे के जुमे कश्मीर के अलगाववादी नेता कश्मीर बंद की कॉल देते आए और दुकाने खोलने वाले कश्मीरी व्यापरियों को पत्थरों से धमकाया जाता रहा, तब क्या कश्मीर में लॉक डाउन नही होता था? तब घरों के भीतर कैद हुए कश्मीरियों की बेबसी, बेबसी नही थी?

ये लॉक डाउन बहुत जरूरी है। जब तक कश्मीर सामान्य नही हो जाता, ऐसे ही सख्त कदम उठाने पड़ेंगे। शुक्र मनाइए कि ये लॉक डाउन भर है। उस तरह से लोग सड़कों पर बंदूक और तलवार लेकर नही दौड़ रहे जैसे 19 जनवरी 1990 को कश्मीरी पंडितों के पीछे दौड़ रहे थे। उन्हें गाजर-मूली की तरह मारकाट कर भगाया जा रहा था। उनकी औरतों के साथ बलात्कार किया जा रहा था। शुक्र मनाइए कि हालात बहुत बेहतर हैं। रहने दीजिए ये लॉक डाउन। धीरे धीरे कश्मीर सामान्य होगा और फिर मुख्यधारा में लौट आएगा। कश्मीर की आम जनता हमारे ही कलेजे का टुकड़ा है।

असली तकलीफ किसे है, ये दुनिया जानती है।

जय हो।

ये लेख वरिष्ठ टीवी पत्रकार अभिषेक उपाध्याय के फेसबुक पेज से साभार लिया गया है। ये लेखक के निजी विचार हैं।

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