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मूंछें हो तो ‘नत्थूलाल’ जैसी और जांच एजेंसी हो तो NIA की तरह

समझौता एक्सप्रेस ब्लास्ट के सारे आरोपी बेदाग छूट गए। और छूटते कैसे नहीं, वो 68 लोग कौन थे ? मरा कौन …मुसलमान…वो भी पाकिस्तान का। चलो हिन्दुस्तान के भी दस लोग थे …लेकिन गेहूं के साथ इतना घुन पिसना तो बनता है।
स्पेशल कोर्ट जज जगदीप सिंह ने कहा कि उन्हें अपने फैसले को लेकर बहुत रंज और गहरा दर्द है, क्योंकि जिन लोगों ने 68 बेगुनाहों की बेरहमी से जान ली …उन्हें सजा नहीं हुई…क्योंकि प्रोसीक्यूशन बचाव पक्ष का किरदार निभा रहा था।
अब इसके बाद …क्योंकि सवाल देश की सर्वोच्च जांच एजेंसी NIA पर उठे थे तो जाहिर है कोई भी गृह मंत्री इस पर परेशान होता, लेकिन हमारे राजनाथ सिंह ने पूरा फैसला आने से पहले ही अपना फैसला सुना दिया कि …बस…अब इस मामले में आगे कोई अपील नहीं। ‘’मेरी निजी राय में हमारे देश में आतंक की हर कार्रवाई के पीछे सिर्फ पाकिस्तान का ही हाथ होता है’’।

इसके बाद बारी थी सरकार के लिए ब्लॉग लिखने के बाद बचे मिनटों और सेकेंडों में देश का वित्त संभालने जैसा गैर जरूरी काम करने वाले मंत्री अरुण जेटली की। अदालत के रंजोगम से दूर पूर्व वकील जेटली ने ऐलान कर दिया कि …कांग्रेस का असली चेहरा देश के सामने आ गया है …कांग्रेस ने महज सियासी फायदे के लिए हिन्दुओं को बदनाम किया था।

लेकिन बीजेपी की परेशानी ये है कि हमारे यहां अदालतें आज भी इतनी समझदार नहीं हुईं कि बेगुनाहों की मौत को जेटली जी की तरह हिन्दू-मुस्लिम वाले नजरिए से देखे। लिहाजा अदालत ने NIA की 12 साल की तफ्तीश पर तीन अहम सवाल उठाए-

1. NIA के पास सबूत भी थे, गवाह भी, लेकिन इसने ‘सबसे अहम सबूत’ को अदालत में पेश ही नहीं किया
2. प्रोसीक्यूशन की ओर से अहम स्वतंत्र गवाहों की गवाही ही नहीं करवाई गई
3. कुछ गवाहों ने जब NIA की बताई लाइन की जगह सच बताने की कोशिश की तो उन्हें होस्टाइल विटनेस करार दिया गया

चार साल पहले अक्टूबर 2015 में मालेगांव मामले में पीपी रोहिणी साल्यान ने कहा था कि NIA के अफसर लगातार उन पर दबाव डाल रहे थे कि मैडम इस मामले में थोड़ा ‘सॉफ्ट’ हो जाइए। पिछले साल मक्का मस्जिद मामले में भी अदालत ने असीमानंद को इसलिए बरी कर दिया क्योंकि जांच एजेंसी अदालत में वो जेल रजिस्टर नहीं पेश कर पाई जिससे ये साबित होता कि असीमानंद और गवाह के बीच जेल में मुलाकात हुई थी।

समझौता ब्लास्ट दरअसल अकेला मामला नहीं था … मक्का मस्जिद, हैदराबाद, अजमेर शरीफ और मालेगांव मिलाकर कुल पांच मामले थे जिन्हें हिन्दू टेरर से जोड़ कर देखा गया। शुरूआत हुई थी मालेगांव से जिसकी तफ्तीश स्वर्गीय हेमंत करकरे ने की थी। 26/11 में करकरे की शहादत के बाद NIA की तफ्तीश धीमी पड़ गई और बीजेपी की सरकार बनने के बाद असीमानंद के बयान के बावजूद टेरर एक्टिविटी में आरएसएस की साजिश वाले एंगल को भी खत्म कर दिया गया।

सवाल है अगर हिन्दू टेरर हमारे यहां है तो क्या गवाहों को धमकाने से… या हमारे आंख मूंद लेने भर से वो खत्म हो जाएगा …Alt right का खूनी चेहरा न्यूजीलैंड देख चुका है, क्या हम इसके लिए तैयार हैं ? या फिर सर्फ एक्सेल-एक्सेल खेलें …?

 

वरिष्ठ पत्रकार आशीष झा की फेसबुक पोस्ट से साभार

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