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बिरयानी के फेर में चटनी से हाथ धो लेना, इसे ही कहते हैं ‘झोलाछाप’ अर्थशास्त्र

झोलाछाप अर्थशास्त्र समझते हैं? बिरयानी के फेर में चटनी से हाथ धोना… या फिरसियाना बनने के चक्कर में लंगोट, धोती नीलाम करा लेना। इसे  ऐसे समझिए… 2014 में बीजेपी ने आरोप लगाया कि यूपीए की नीति की वजह से कोयला ब्लॉक आवंटन में सरकार को1067300 करोड़ रुपये का नुक़सान हुआ है। हालांकि तत्कालीन सीएजी विनोद राय ने संसद में जो रिपोर्ट पेश की उसमें कहा गया कि कुल 18560 करोड़ रुपये का ही नुक़सान है, लेकिन तब तक यूपीए सरकार की ऐसी तैसी हो चुकी थी। असल में सीएजी की ये रिपोर्ट अनुमान पर आधारित थी। तमाम कोयला ब्लॉक 2004-2009 के बीच आवंटित किए गए थे। इनमें से 60% एनटीपीसी और स्टील अथाॅरिटी जैसी सरकारी कंपनियों के पास थे। इनमें कुछ प्राइवेट कंपनियों ने आवंटित ब्लाॅक तीन चार साल अपने पास रखकर मुनाफे के साथ बेच दिए। ये मुनाफा ही आरोपों का आधार था। सरकार का कहना था कि बिजली और स्टील कंपनियों को बाज़ार दर से कम पर कोयला इसलिए दिया गया ताकि बिजली और स्टील जैसी बुनियादी ज़रूरत की चीज़ों के दाम कम रखे जा सकें और तीन से पांच साल में उनकी बाज़ार क़ीमत भी बढ़ गई है, लेकिन बीजेपी ने इसे घोटाला बताया।

बहरहाल, मामला सुप्रीम कोर्ट गया, 218 में से 214 कोयला ब्लॉक के आवंटन रद्द हुए, सरकार बदली और कोयला ब्लॉकों की दोबारा नीलामी हुई। विनोद राय को अपनी सेवा के बदले ईनाम मिल गया। इसके बाद सरकार ने दावा किया कि दोबारा नीलामी में लगभग 2 लाख करोड़ रुपये हासिल हुए हैं। मतलब क़रीब दोगुना। सरकार ने अपनी पीठ थपथपाई, लोगों ने वाहवाही की और फिर भूल गए। अब ज़रा पूछिए लोगों से कि वो दो लाख करोड़ कहां गए और सरकार को इससे कितना मुनाफा हुआ और सरकार ने वो कहां ख़र्च किए?

ताज़ा मामला ये है कि महंगे कोयला ब्लॉक ख़रीदने वाली तमाम बिजली कंपनियों ने बिजली के दाम बढ़ा दिए। बढ़े हुए पैसे सरकार के अलावा लोगों को भी चुकाने पड़े। स्टील के दाम बढ़े जिससे मांग घटी और स्टील कंपनियों का घाटा बढ़ गया। इसकी क़ीमत भी ज़ाहिर है लोगों पर ही पड़ी। लेकिन इस सबके बावजूद हालात क़ाबू में नहीं आए। तमाम कंपनियां दिवालिया हो गईं और उन्होंने बैंकों का लोन चुका पाने में असमर्थता जताई है। देश की 75 बिजली कंपनियों पर बैंकों का 2.75 लाख करोड़ रुपया बक़ाया है। इनमें से क़रीब डेढ़ लाख करोड़ को एनपीए या डूबा हुआ क़र्ज़ मान लिया गया है। बैंकों का कहना है बिजली कंपनियों की सारी परिसंपत्तियां बेच दी जाएं तब भी डेढ़ लाख करोड़ कभी वापस नहीं लौटेंगे।

यही हाल स्टील कंपनियों का भी है। देश में तमाम स्टील और बिजली कंपनियां बंद हुई हैं और इसके चलते लाखों लोग बेरोज़गार भी हुए हैं। कुल मिलाकर महंगा कोयला बेचकर सरकार ने जो एक लाख करोड़ रुपये लालाओं से वसूले थे, लालाओं ने उसका तीन गुना बैंकों से वसूल लिया है और हाथ खड़े कर दिए हैं। जनता से दोगुना वसूली हुई है अलग। इस बीच घोटाले के तमाम आरोपी बरी हो गए। जो बचे हैं, वो हो जाएंगे। इधर इस मामले की जांच और संसद के ख़र्च पर ही हज़ारों करोड़ स्वाहा हुए, उनका कोई हिसाब किताब नहीं है। अब वाले सीएजी में हिम्मत नहीं है कि देश को हुए इस चार लाख करोड़ से ज़्यादा के नुक़सान का ऑडिट करे। सरकार अब भी घाटे में है और उसकी रिज़र्व बैंक के पास रखी आपकी बचत जमा पर जम गई है।

मज़ेदार बात ये है कि सरकार और सत्ताधारी पार्टी का आईटी सेल देश की आर्थिक मंदी का ठीकरा वैश्विक हालात पर फोड़ रहे हैं। कोई उन मुद्दों पर बात नहीं कर रहा जिनकी वजह से बाज़ार और अर्थव्यवस्था की ऐसी तैसी हुई है। वैसे नेहरू इस सबके लिए ज़िम्मेदार हैं क्योंकि उन्होंने ही कहा था कि सरकार बनिए की दुकान नहीं है। उसका काम मुनाफा कमाना नहीं बल्कि लोगों को सुविधाएं उपलब्ध कराना है। सरकार की चतुर बनियागीरि को नेहरू की नज़र लग गई है। इतिश्री वंदे मातरम् कथा 😊

ये लेख वरिष्ठ टीवी पत्रकार जैगम मुर्तजा के फेसबुक पेज से साभार लिया गया है। ये लेखक के निजी विचार हैं।

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