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भागवत के इस प्लान से ही हो सकता है भाजपा का तारण हार…

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नई दिल्ली । नवम्बर 2015 में हुए बिहार विधानसभा चुनाव के दो माह पहले सितम्बर में पांचजन्य व आर्गेनाइजर संघ प्रमुख मोहन भागवत का साक्षात्कार छपा था । जिसमें उन्होंने आरक्षण पर नीतिगत विचार करने की बात कही थी। उनके इस कहे को विपक्षी दलों ने चुनावी मुद्दा बना दिया था। और बिहार में भाजपा की जदयू – राजद –कांग्रेस गठबंधन से करारी हार का ठिकरा संघ प्रमुख पर फोड़ दिया गया था कि इनके बयान के कारण राज्य में भाजपा की हार हुई। उस साक्षात्कार में भागवत से किया गया सवाल और उसका जवाब निम्न था , सवाल – * आपने कहा कि प्रामाणिकता ही कसौटी होती है। कोई ऐसी नीति जिसमें आपको लगता हो कि ये ठीक है और पूरी प्रामाणिकता से लागू की गई, ऐसी नीतियों से एकात्म मानव दर्शन साकार हो सकता है।

क्या ऐसी कोई एक नीति आपको दिखाई देती है जो लागू की गई है या नहीं भी की गई है? आपकी क्या कल्पना है? जवाब-“जैसे अपने संविधान में सामाजिक पिछड़े वर्ग पर आधारित आरक्षण नीति की बात है तो उसको राजनीति के बजाय जैसा संविधानकारों के मन में था, वैसा उसको चलाते तो आज ये सारे प्रश्न नहीं खड़े होते। संविधान में जब से यह प्रावधान आ गया तब से उसका राजनीति के रूप में उपयोग किया गया है। हमारा कहना है कि एक समिति बना दो। जो राजनीति के प्रतिनिधियों को भी साथ ले, लेकिन चले उन लोगों की जो सेवाभावी हों तथा जिनके मन में सारे देश के हित का विचार हो। उनको तय करने दें कि कितने लोगों के लिए आरक्षण आवश्यक है। कितने दिन तक उसकी आवश्यकता पड़ेगी। इन सब बातों को लागू करने का पूरा अधिकार उस समिति के हाथ में हो। ध्यान में रखना होगा कि ये सारी बातें प्रामाणिकता से लागू हों ”। उनके इस साक्षात्कार के छपे 03 वर्ष 04 माह हो गये।

दिसम्बर 2018 में हुए म.प्र.,छत्तीसगढ़ व राजस्थान विधानसभा चुनाव में हार के बाद भाजपानीत केन्द्र सरकार ने आगामी लोकसभा चुनाव के मद्देनजर आर्थिक आधार पर गरीब सवर्णों के लिए नौकरियों व शैक्षणिक संस्थानों में 10 प्रतिशत आरक्षण का विधेयक (बिल) लाकर संसद में , लोकसभा में बीते मंगलवार 08 जनवरी 2019 को और राज्यसभा में बुधवार 09 जनवरी को पास करा दी। इस विधेयक को शनिवार 12 जनवरी को राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने मंजूरी दे दी । जिसके बाद कानून मंत्रालय ने इसकी अधिसूचना 12 जनवरी को जारी कर दी। पहले से दिये जा रहे आरक्षण कोटे से अतिरिक्त यह सामान्य वर्ग के गरीब लोगों के लिए आरक्षण दिया गया है । यानि पहले जिनको , जिस जाति , वर्ग को जितना आरक्षण मिल रहा है उनमें कोई बदलाव नहीं होगा।

लेकिन केन्द्रीय सामाजिक न्याय मंत्री व दलित नेता रामदास आठवाले ने कहा है कि आर्थिक रूप से कमजोर सवर्णों को 10 प्रतिशत आरक्षण दे दिया गया।अब इसी तरह से ओबीसी में आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को 10 प्रतिशत अतिरिक्त आरक्षण दिया जाना चाहिए। इस तरह ओबीसी को मिलने वाले 27 प्रतिशत आरक्षण के अलावा 10 प्रतिशत और आरक्षण देकर 37 प्रतिशत किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि अब संविधान में संशोधन के बाद आरक्षण की सीमा 50 प्रतिशत खत्म कर दी गई । सो अब ओबीसी में आर्थिक रूप से कमजोर जातियों को अलग से 10 प्रतिशत आरक्षण दिया जाये। इस बारे में विहिप के एक नेता का कहना है इस तरह से आरक्षण देते रहने के बजाय सभी जातियों के गरीबों के लिए आर्थिक आधार पर आरक्षण दे दिया जाना चाहिए। और इसके अलावा सभी जातियों में जो परिवार बहुत ही गरीब हैं उनके लिए आठवीं तक स्कूलों में मुफ्त में शिक्षा , पुस्तक आदि की व्यवस्था करनी चाहिए।

यह होने पर ही सबको समान अवसर मिल सकता है। वरना बहुत सी जातियां जो आरक्षण का लाभ पाकर बहुत मजबूत हो गई हैं उनका नौकरी से लेकर हर जगह वर्चस्व बढ़ता जायेगा । समाज में एक अलग तरह की असमानता आती जायेगी। इसलिए संघ प्रमुख मोहन भागवत के सुझाव को विचार – विमर्श व आपसी सहमति से लागू करना सभी जाति , समाज व देश ,धर्म के लिए हितकर रहेगा । आखिर अभी गरीब सवर्णों को आरक्षण देना पड़ा है। इसको व्यापक बना एक क्रिमिलेयर सभी आरक्षण में लागू करके आर्थिक आधार पर सभी जातियों के लिए आरक्षण लागू कर दिया जाना चाहिए। बिना इसके इस आरक्षण के जंजाल से मुक्ति मिलनी मुश्किल है।

वरना इसको लेकर तरह 

तरह की मांगे शुरू होती रहेंगी। वरिष्ठ पत्रकार डा.हरि देसाई का कहना है कि कई विपक्षी दलों के ओबीसी जातियों के नेताओं ने कहना शुरू कर ही दिया है कि यह तो पिछड़ी जातियों और अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजातियों को मिल रहे आरक्षण में धीरे-धीरे कटौती करने की योजना के तहत किया गया है। आगे इन जातियों को मिलने वाले आरक्षण को क्रिमिलेयर के आधार पर काटा जायेगा और अभी गरीब सवर्णों के आरक्षण के लिए जो आर्थिक आधार बनाया गया है उसे ही अन्य सभी जातियों के गरीबों के लिए लागू कर दिया जायेगा।

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