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आज जिस मुकाम पर हैं पीएम मोदी, वहां पहुंचाने में सबसे बड़ा रोल अदा किए अरुण जेटली

वरिष्ठ बीजेपी नेता, पूर्व वित्त मंत्री और पीएम मोदी के सबसे बड़े संकटमोचक अरुण जेटली का शनिवार को अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में निधन हो गया. जेटली को एम्स में एक्स्ट्रा कॉरपोरल मेंब्रेन ऑक्सीजेनेशन (ईसीएमओ) पर रखा गया था. इस पर उन्हीं मरीजों को रखा जाता है, जिनका फेफड़ा और दिल काम नहीं कर पाता. मिली जानकारी के मुताबिक़ 12 बजकर 7 मिनट पर जेटली ने अंतिम सांस ली.

हर किसी को अरुण जेटली की कमी खलेगी. लेकिन सबसे ज्यादा खलेगी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को. जेटली को मोदी का विश्वासपात्र माना जाता था. हालांकि, स्वास्थ्य कारणों से जेटली इस बार के मोदी मंत्रिमंडल से बाहर थे. लेकिन जब भी मोदी सरकार कहीं फंसती, तो वो सबसे पहले सामने आते और उस परेशानी का तोड़ निकाल लेते. यूं तो मोदी के इस नए कार्यकाल में सब कुछ अच्छा है.

याद कीजिए, जब पीएम मोदी अपना पहला कार्यकाल संभल रहे थे तब जेटली वो पहले व्यक्ति थे जो उनके पास आए थे. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और जेटली का रिश्ता और सामंजस्य कैसा रहा है? इसे हम ऐसे भी समझ सकते हैं कि, जब मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री हुआ करते थे भी तब भी उनकी जेटली से खूब जमती थी. तब ऐसे तमाम मौके आए जब दोनों ने अहम मुद्दों पर सलाह मशवरा किया था.

जेटली केंद्रीय भाजपा नेताओं के उस पहले समूह में से थे, जिन्होंने नरेंद्र मोदी के लिए नेतृत्व की भूमिका निभाई थी. जेटली का शुमार उन चुनिंदा व्यक्तियों में होता है, जिन्होंने 2014 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी को भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में नामित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, जिसमें पार्टी के दिग्गज नेताओं जैसे लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी को साइड लाइन होते देखा गया था.

पहली मोदी सरकार में जेटली के साथ, केंद्रीय मंत्रिमंडल का शक्ति समीकरण भी बदल गया था. इससे पहले, केंद्रीय गृह मंत्री को नंबर 2 माना जाता था, लेकिन पिछले पांच वर्षों में, वित्त मंत्री के रूप में जेटली पूरी कैबिनेट में दूसरे सबसे शक्तिशाली व्यक्ति के रूप में उभरे. पीएम मोदी के लगभग सभी प्रमुख और व्यापक कार्यक्रमों जैसे जन धन योजना, आधार लिंकिंग, डिमनेटाइजेशन, माल और सेवा कर के रोलआउट, बेनामी संपत्ति कानून और दिवाला संहिता को वित्त मंत्रालय से कार्यान्वित किया गया था. हालांकि जेटली कानून मंत्री नहीं थे, लेकिन उन्होंने सभी बड़े मुद्दों पर मोदी सरकार को महत्वपूर्ण जानकारी दी ताकि वो उन्हें सुप्रीम कोर्ट में भेज सके.

बात अगर शक्ति और उसके प्रदर्शन कि हो तो चाहे वो विमुद्रीकरण रहा हो या फिर जीएसटी और राफेल सौदा तमाम अहम मोर्चों पर जितने भी विवाद हुए, अरुण जेटली वो पहले व्यक्ति रहे जो प्रधानमंत्री का बचाव करने और उनकी तरफ से मोर्चा लेने के लिए सबसे पहले सामने आए. चूंकि लोकसभा चुनाव 2019 के दौरान राफेल लोगों की जुबान पर काफी रहा. ऐसे में भले ही अरुण जेटली रक्षा मंत्री न रहे हों. मगर जैसे उन्होंने राफेल सौदे को लेकर सरकार का पक्ष रखा, ऐसे तमाम मौके आए जब उनकी कही बातों ने कांग्रेस और राहुल गांधी दोनों को भारी मुसीबतों में डाला.

आज वो हमारे बीच नहीं हैं. उनकी कमी इस देश को हमेशा खलेगी.

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