राजनीति

पीएम मोदी पर विरोधियों ने बरसाए जो पत्थर, जेटली ने उनसे ही खड़ा कर दिया ‘सत्ता का महल’

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने निजी और सार्वजनिक जीवन में कई दोस्त बनाए, तो कई लोग उनकी कार्यशैली के कारण उनके दुश्मन बन गए. जब तक वे संगठन में थे, तब तक चुनावी राजनीति से उनका कोई संबंध नहीं था, परंतु 2001 में अचानक मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री बनते हैं और 2012 के बाद पूरे देश के लोकप्रिय नेता बन जाते हैं. इसके बाद उनके विरोधियों की संख्या में दिन दूनी और रात चौगुनी की रफ्तार से इजाफा हुआ.

बड़े-बड़े दिग्गज नामों के बीच 2012 में अचानक गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी देश के सबसे लोकप्रिय नेता के रूप में उभरे, तो राष्ट्रीय राजनीति में विशेषकर भाजपा की अग्रिम पंक्ति के नेताओं में अनेक अंतर्विरोध पैदा हुए. ऐसे में मोदी की आगे की राह अत्यंत पथरीली थी, परंतु इस सबके बीच एक शख्स ऐसा था, जो मोदी की राह के हर शूल को फूल बनाने में जुटा हुआ था.

हम बात कर रहे हैं पूर्व वित्त मंत्री और भाजपा के वरिष्ठ मंत्री अरुण जेटली की, जिनका शनिवार को निधन हो गया. 28 नवम्बर, 1952 को दिल्ली में जन्मे और स्कूली शिक्षा के बाद बीकॉम करते हुए एलएलबी तक पढ़ाई करने वाले जेटली विद्यार्थी काल से अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् से जुड़े और 1973 में इसके अध्यक्ष बने. आपातकाल के दौरान 19 महीने जेल में काटे. जय प्रकाश नारायण द्वारा गठित राष्ट्रीय छात्र समिति के संयोजक रहे जेटली ने आपातकाल के बाद जनसंघ में प्रवेश किया. 1980 में भाजपा के गठन के बाद जेटली को दिल्ली भाजपा सचिव बनाया गया.

1991 से जेटली ने भाजपा राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य की राजनीति के साथ-साथ अनेक उच्च न्यायालयों सहित उच्चतम् न्यायालय में वक़ालत भी की और उनकी यही वक़ालत वर्तमान भाजपा के दो दिग्गज नेताओं नरेन्द्र मोदी और अमित शाह के राह की हर वैधानिक चुनौतियों को समाप्त करने में काम आई.

बात गुजरात विधानसभा चुनाव 2012 में मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा को लगातार तीसरी जीत के बाद की है. देश के अनेक हिस्सों में मोदी के गुजरात का विकास मॉडल छा गया और देखते ही देखते गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी देश के लोगों के लिए प्रधानमंत्री पद की पहली पसंद बन कर उभरे. यहीं से जेटली ने मोदी के ‘मिशन प्रधानमंत्री’ का दमदार खाक़ा खींचा. 2012-2014 के दौर में भाजपा पर लालकृष्ण आडवाणी, सुषमा स्वराज, राजनाथ सिंह, नितिन गडकरी, शिवराज सिंह चौहान, उमा भारती जैसे कई दिग्गजों की मजबूत पकड़ थी, परंतु जेटली ने जनता के मिजाज को परखते हुए अपनी किसी भी निजी महत्वाकांक्षा को ऊपर न आने देते हुए मोदी के दिल्ली आने का मार्ग प्रशस्त करना शुरू किया.

गुजरात दंगों को लेकर मोदी को कई कानूनी पेचीदिगयों से बाहर निकालने वाले जेटली ने मोदी को प्रधानमंत्री पद का चेहरा घोषित कराने में एक रिंग मास्टर की भूमिका निभाई. एक छोर पर सुषमा स्वराज आडवाणी के प्रति अपनी निष्ठावान बनी रहीं, तो दूसरे छोर पर आडवाणी ने भविष्य को भाँपते हुए मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनवाने पर तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह सहित दिग्गज नेताओं के साथ सहमति साधने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.

अरुण जेटली संगठन में रह कर जहाँ मोदी के मार्ग के एक-एक काँटे दूर कर रहे थे, वहीं राज्यसभा में विपक्ष के नेता के रूप में तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार की बखिया उधेड़ कर सरकार के विरोध और भाजपा-मोदी के पक्ष में माहौल बनाने में भी जुटे हुए थे. जेटली ने मोदी के दिल्ली पहुँचने से पहले लगे चुनौतियों के अंबार को एक-एक कर छाँटा और हर प्रतिकूल परिस्थिति में मोदी के साथ कंधे से कंधा मिला कर खड़े रहे.

अरुण जेटली एक तरह से नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाने वाले लीड आर्किटेक्चर बन गए और अंतत: भाजपा ने न केवल 2014 में नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया, अपितु नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री बन भी गए. यह जेटली का ही करिश्मा था कि मोदी के नाम पर करंट महसूस करने वाले जनता दल ‘युनाइटेड’ (जेडीयू-JDU) के अध्यक्ष और बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार दोबारा एनडीए का हिस्सा बने. यह जेटली का करिश्मा था कि मोदी की अक्सर आलोचना करने वाले कांग्रेस के दिग्गज नेता और पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी के मुँह से मोदी के लिए प्रशंसा के शब्द फूटे. मोदी के पास मुख्यमंत्री के रूप में काम करने का तो अनुभव था, परंतु दिल्ली में बैठ कर राजनीति करने और देश चलाने के गुर जेटली ने उन्हें सिखाए.

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