बंगाल में मोदी की हवा से हिली ममता की नीव, अब दीदी के सामने सिर्फ 2 रास्ते

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कोलकाता । पश्चिम बंगाल में भाजपा के जनाधार में अभूतपूर्व बढ़ोतरी ने टीएमसी अध्यक्ष ममता बनर्जी को मुश्किल में डाल दिया है। इसके साथ ही राज्यभर में अब यह चर्चा तेज हो गई है कि 2021 के विधानसभा चुनाव के बाद राज्य में किसकी सरकार होगी?  चर्चा में यह बात भी है कि तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) ममता बनर्जी केंद्रित पार्टी है और अगर सत्ता नहीं रही तो पार्टी का आधार बचाकर रखना मुश्किल होगा। ममता के भतीजे अभिषेक बनर्जी के राजनीति में सक्रिय होने के साथ ही टीएमसी के संस्थापक रहे कई नेताओं को हाशिए पर धकेल दिया गया। वर्ष 2018 की शुरुआत में ममता ने अभिषेक को अपनी पार्टी का उत्तराधिकारी तक घोषित कर दिया था। इस बीच राज्य में जमीन तलाशने में जुटी भाजपा को ममता के ही सबसे करीबी रहे मुकुल रॉय राजनीतिक सारथी के रूप में मिल गए और 2018 के पंचायत चुनाव में राज्यभर में पार्टी की भारी बढ़त ने राज्य में राजनीतिक परिवर्तन का संकेत दे दिया था।
सत्रहवीं लोकसभा चुनाव में भाजपा ने राज्य की 42 में से 18 सीटों पर कब्जा जमा लिया, जबकि टीएमसी ने 22 सीटें जीतीं। वर्ष 2014 के चुनाव में टीएमसी ने 34 और भाजपा ने एक सीट पर जीत दर्ज की थी। भाजपा की इस प्रचंड जीत ने न केवल पार्टी कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाया है बल्कि सत्तारूढ़ तृणमूल में भी खलबली मचा दी है। भाजपा नेता मुकुल रॉय ने रविवार को हिन्दुस्थान समाचार से बातचीत में कहा कि ममता के कई विधायक लगातार उनके संपर्क में हैं और भाजपा में आना चाहते हैं।
ममता के पूर्व सहयोगी बैरकपुर के नवनिर्वाचित सांसद भाजपा नेता अर्जुन सिंह ने कहा कि बंगाल में विधानसभा चुनाव के लिए हम लोग 2021 का इंतजार नहीं करना चाहते। लोकसभा में प्रचंड बहुमत के बाद अब हमारा एक ही लक्ष्य है, ममता को बंगाल से उखाड़ फेंकना।मुकुल रॉय भी कह चुके हैं कि ममता की सरकार गिर जाएगी। इन दोनों नेताओं का यह बयान राज्य में और बड़ी चर्चा को जन्म दिया है।पार्टी के विश्वस्त सूत्रों ने कहा कि यदि राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू होता है तो ममता को सहानुभूति का फायदा मिलेगा। विधानसभा चुनाव में इसका लाभ ममता को मिल सकता है। इसलिए भाजपा इतनी बड़ी गलती नहीं करेगी।
एक दूसरा रास्ता यह बचा है कि अगर ममता की पार्टी के अधिकतम विधायक धीरे-धीरे टूट जाएं और उनकी सरकार अल्पमत में आ जाए तब चुनाव कराना मजबूरी हो जाएगी। भाजपा की कोशिश है कि टीएमसी के विधायकों को अपने पाले में किया जाए। इसके लिए पार्टी एक कदम आगे बढ़ा रही है तो विधायक दो कदम आगे बढ़कर भाजपा की ओर आ रहे हैं। इसके अलावा पार्टी की युवा इकाई और मूल इकाई में गुटबाजी चरम पर है। विधायकों का पार्षदों से, सांसदों का विधायकों से, पार्टी अध्यक्षों का जनप्रतिनिधियों से प्रत्येक जिले में आपसी विवाद है। इस परिस्थिति का भी लाभ भाजपा उठाने में जुट गई है।
कुल मिलाकर देखा जाए तो राज्य में एक ऐसी स्थिति बनी है जो हर किसी के लिए एक चर्चा का केंद्र बिंदु बन गया है। इस बीच हार के बाद शनिवार को मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने पार्टी के शीर्ष नेताओं के साथ पहली समीक्षा बैठक की थी और 31 मई को महत्वपूर्ण अंतिम समीक्षा बैठक बुलाई है। तृणमूल नेताओं के मुताबिक संगठन को मजबूत करने के लिए ममता कुछ कड़े फैसले कर सकती हैं। वह खुद आगे बढ़कर भगवा लहर का सामना करेंगी। वह पार्टी को और ज्‍यादा समय देंगी। पार्टी के दो से तीन नेता उनके रडार पर हैं। बताया गया है कि पार्टी को एकजुट करने के साथ भाजपा का मुकाबला करने के लिए ममता बनर्जी ने स्वयं कमान संभालने का निर्णय लिया है।
उल्लेखनीय है कि टीएमसी ने जिन 22 लोकसभा सीटों पर जीत दर्ज की उनमें अंतिम चरण की मतगणना तक कांटे का मुकाबला देखा गया। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के कार से उतरने और ‘‘जय श्री राम’’ का नारा लगा रहे कुछ युवकों को धमकाने वाले वायरल वीडियो से ठीक संदेश नहीं गया और भाजपा ने चुनाव के ध्रुवीकरण के लिए इस घटना को भुनाया। पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव में दो साल का वक्त है, जबकि नगर निगम चुनाव अगले साल हैं। ऐसे में उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती पार्टी को एकजुट रखने की है।