राजनीति

सिर्फ CM के लिए नहीं अड़ी है शिवसेना, अहंकार और बदला है असल वजह

महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में जनता ने भाजपा (105)-शिवसेना (56) गठबंधन को 161 सीटों पर भव्य जीत देकर कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस को विपक्ष में बैठने का जनादेश दिया. लेकिन शिवसेना के ढाई वर्ष के लिए मुख्यमंत्री पद मांगने की जिद के कारण महाराष्ट्र में नई सरकार के गठन में गतिरोध बना हुआ है. मुख्यमंत्री पद को लेकर भाजपा-शिवसेना के बीच जारी मतभेद के कारण राज्य में 10 दिनों के बाद भी नई सरकार का गठन नहीं हो सका है.

भगवा गठबंधन की दोनों पार्टिया अब एक-दूसरे पर अहंकार का आरोप लगा रही हैं. वास्तव में लोकसभा चुनाव 2014 के बाद भाजपा ने महाराष्ट्र में अपनी ताक़त लगातार बढ़ाई और वर्षों से महाराष्ट्र में शिवसेना की जूनियर पार्टी बने रहने की स्थिति से स्वयं को बाहर निकाला. विधानसभा चुनाव 2014 में भाजपा ने अकेले दम पर चुनाव लड़ कर सरकार भी बनाई, जिसके साथ ही शिवसेना की ताक़त घटने लगी. अब जबकि 2019 में भाजपा की स्थिति थोड़ी कमज़ोर हुई, तो शिवसेना भाजपा पर हावी होने का राजनीतिक खेल खेल रही है.

शिवसेना को पुन: वही बड़े भाई वाला रुतबा चाहिए, जो कभी बाला साहब ठाकरे के जीवनकाल में उसे मिला हुआ था, परंतु चुनाव परिणामों के आँकड़े स्पष्ट कहते हैं कि जनता ने शिवसेना इतना बहुमत नहीं दिया है कि वह ढाई साल का मुख्यमंत्री पद मांग सके. यदि ऐसा ही है, तो अन्य उम्मीदवारों को 18 प्रतिशत और एनसीपी को भी 16 प्रतिशत से अधिक मत मिले हैं.

शिवसेना यदि 16 प्रतिशत मत पाकर मुख्यमंत्री पद पाना चाहती है, तो फिर शरद पवार भी मुख्यमंत्री पद के दावेदार कहे जा सकते हैं. वास्तव में शिवसेना प्रतिशोध की आग में जल रही है. अहंकार-प्रतिशोध की इस लड़ाई में अंतत: हानि भाजपा और शिवसेना दोनों को ही होगी, लाभ किसी को भी नहीं होगा.

 

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