सावन विशेष: भोलेनाथ के सभी श्रृंगार के पीछे छिपा है जीवन से जुड़ा रोचक राज, जानकर रह जायेंगे हैरान

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शिव या महादेव हिंदू धर्म में सबसे महत्वपूर्ण देवताओं में से एक है। वह त्रिदेवों में एक देव हैं। इन्हें देवों के देव भी कहते हैं। इन्हें भोलेनाथ, शंकर, महेश, रुद्र, नीलकंठ, गंगाधार आदि नामों से भी जाना जाता है। तंत्र साधना में इन्हे भैरव के नाम से भी जाना जाता है।हिन्दू धर्म के प्रमुख देवताओं में से हैं। वेद में इनका नाम रुद्र है। यह व्यक्ति की चेतना के अन्तर्यामी हैं|हमारी परंपरा में भगवान शिव को कई सारी वस्तुओं से सजा हुआ दिखाया जाता है। उनके माथे पर तीसरी आंख, उनका वाहन नंदी, और उनका त्रिशूल इसके उदाहरण हैं। क्या सच में शिव के माथे पर एक और आंख है? और क्या वे हमेशा नंदी और त्रिशूल को अपने साथ रखते हैं? या फिर इन्हें चिन्हों की तरह इस्तेमाल करके हमें कुछ और समझाने की कोशिश की गई है? आइये जानते हैं ।

तीसरी आंख

शिव की जो तस्वीर हमारे मस्तिष्क में अंकित है उसमें शिव को तीन नेत्रों वाला दिखाया गया है। माना गया है कि मनुष्य की दो आँखें सांसारिक वस्तुओं को दर्शाता है। वहीं शिव की तीसरी नेत्र सांसारिक वस्तुओं से परे संसार को देखने का बोध कराती है। यह एक दृष्टि का बोध कराती है जो पाँचों इंद्रियों से परे है। इसलिये शिव को त्रयंबक कहा गया है।

रुद्राक्ष का अर्थ है

रूद्र का अक्ष , माना जाता है कि रुद्राक्ष की उत्पत्ति भगवान शिव के अश्रुओं से हुई है. रुद्राक्ष को प्राचीन काल से आभूषण के रूप में,सुरक्षा के लिए,ग्रह शांति के लिए और आध्यात्मिक लाभ के लिए प्रयोग किया जाता रहा है|रुद्राक्ष कलाई , कंठ और ह्रदय पर धारण किया जा सकता है| सच्चे मन से भगवान भोले की आराधना करने के बाद रुद्राक्ष धारण करने से तन-मन में सकारात्मकता का संचार होता है।

शिव का वाहन  नंदी

भगवान शिव का वाहन प्रतीक्षा का प्रतीक है | भारतीय संस्कृति में इंतजार को सबसे बड़े गुण के रूप में  मान्यता दी गई है | जो चुप  बैठ कर इंतजार करना जानता है और नंदी को ऐसी आसा भी नहीं है |शिव कल आ जाएंगे | वह किसी बात का अनुमान भी नहीं लगापाता |नंदी शिव का सबसे करीबी और चाहिता साथी है क्योंकि उसमें ग्रहण शीलता यानि धैर्यका गुण है |

श‌िव जी का त्र‌िशूल

शिव का त्रिशूल मानव शरीर में मौजूद तीन मूलभूत नाड़ियों बायीं, दाहिनी और मध्य का प्रतिबिंब है। इनसे 72,000 नाड़ियाँ निकलती हैं। सजगता की स्थिति में यह बात महसूस की जा सकती है कि उर्जा की गति अनियमित न होकर निर्धारित पथों यानी 72,000 नाड़ियों से होकर गुजर रही है।

सर्प

योग संस्कृति में, सर्प यानी सांप कुंडलिनी का प्रतीक है। यह आपके भीतर की वह उर्जा है जो फिलहाल इस्तेमाल नहीं हो रही है। कुंडलिनी का स्वभाव ऐसा होता है कि जब वह स्थिर होती है, तो आपको पता भी नहीं चलता कि उसका कोई अस्तित्व है। केवल जब उसमें हलचल होती है, तभी आपको महसूस होता है कि आपके अंदर इतनी शक्ति है। जब तक वह अपनी जगह से हिलती-डुलती नहीं, उसका अस्तित्व लगभग नहीं के बराबर होता है।

शीश पर गंगा

जब पृथ्वी की विकास यात्रा के लिए माता गंगा का आव्हान किया गया तब शिव जी ने अपनी जटाओं में गंगा माँ को स्थान दिया।इस बात से यह सिद्ध होता है कि दृढ़ संकल्प के माध्यम से किसी भी अवस्था को संतुलित किया जा सकता है।

चन्द्रमा

स्वभाव से शीतल चंद्रमा को धारण करने का अर्थ है कि कितनी भी कठिन परिस्थिति क्यों न हो,लेकिन मन को हमेशा ठंडा ही रखना चाहिए।

डमरू

भगवान शिव के हाथों में विद्यमान डमरू दर्शाता है की इसे बजाने से आकाश, पाताल एवं पृथ्वी एक लय में बंध जाते हैं