सावन में इन चीजों से भूलकर भी ना करें शिवजी की पूजा, जानें पौराणिक नियम

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अति पवित्र सावन माह भगवन शिव का सबसे प्रिय माह कहलाता है। शास्त्रीय मान्यताओं के अनुसार इस माह शिव पूजन करने से मनुष्य को पापो से मुक्ति मिलती है। इस माह शिवलिंग पूजन का विशेष महत्व माना जाता है। शिव पुराण के अनुसार, त्रिलोक धरी भगवन शिव तीनो लोको के स्वामी है, भूत, भविष्य, वर्तमान और समय महादेव के अनुयायी, यानी उनके बिना जगत में पत्ता तक नहीं हिलता है। ऐसे में भगवन शिव की पूजा मात्र से मनुष्य का उद्धार होता है। ज्योतिषाचार्यो के मुताबिक, इस माह पवित्र गंगा जल से शिवलिंग पूजन करने से मनोवांछित फल प्राप्ति के योग बनते है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भगवन शिव वैरागी है, इसलिए उनके पूजन में भी विशेष नियमो का पालन किया जाता है। मान्यताओं के अनुसार, बैसे तो भगवन शिव मात्र एक बेल पत्र से अपने भक्तो की झोली भर देते है। लेकिन शास्त्रीय नियमानुसार कुछ चीजे शिव पूजन में वर्जित मानी जाती है। माना जाता है, इन चीजों के इस्तेमाल से शिव पूजा अधूरी व शिव को क्रोधित करती है। इसलिए आज हम आपके लिए कुछ ऐसी ही चीजों के बारे जानकारी लाये है। जिनका प्रयोग शिव पूजन में वर्जित यानी निषेध माना जाता है। साफ़ शब्दों में कहे, तो भूलकर भी इन चीजों का प्रयोग शिव पूजन में नहीं करना चाहिए। तो आइये जानते है, थोड़ा विस्तार से।

शिव पूजन में वर्जित वस्तुएं

हल्दी- शिवलिंग पर कभी भी हल्दी नहीं चढ़ाई जाती है। क्योंकि यह महिलाओं की सुंदरता को बढ़ाने के लिए इस्तेमाल होती है। और भगवान शिव तो वैसे ही सुंदर है। जिसके कारण भगवान शिव के प्रतीक शिवलिंग पर हल्दी नही चढाई जाती है। तो हमेश याद रखिये जब भी आप सावन में शिवलिंग पूजन के लिए जाए तो शिव जी को हल्दी का लेप न लगाए।

कुमकुम- हल्दी की तरह ही शिव की पूजा में कुमकुम चढ़ाना वर्जित माना गया है। शिवलिंग की पूजा में कभी भी कुमकुम को शामिल नहीं करना चाहिए। कुमकुम सुहाग की निशानी है। शिव पूजा में चंदन का इस्तेमाल शुभ माना गया है।

त‌िल या तिल से बनी कोई वस्तु न चढ़ाएं- यह भगवान व‌िष्‍णु के मैल से उत्पन्न हुआ मान जाता है, इसल‌िए इसे भगवान श‌िव को नहीं अर्प‌ित क‌िया जाना चाह‌िए। याद रखे भगवन शिव विष्णु जी के आराध्य के रूप में पूजनीय है। शास्त्रों के अनुसार विष्णु जी के मैल से उत्पन्न तिल का प्रयोग शिव पूजन में पूर्णतः वर्जित माना गया है।

टूटे हुए चावल- भगवान श‌िव को अक्षत यानी साबूत चावल अर्प‌ित क‌िए जाने के बारे में शास्‍त्रों में ल‌िखा है। टूटा हुआ चावल अपूर्ण और अशुद्ध होता है, इसल‌िए यह श‌िव जी को नहीं चढ़ता। ध्यान योग्य बात ये है कि शास्त्रों के अनुरूप अक्षत का प्रयोग अभिषेक के रूप में होता है। एवं अक्षत का प्रयोग हल्दी व कुमकुम के साथ शुभ होता है। चूँकि हल्दी व कुमकुम दोनों ही वस्तुए शिव पूजन में वर्जित है इस तरह टूटे हुए चावल शिव पूजन में पूर्णतः निषेध है। चावल की जगह जौं का प्रयोग अत्यंत शुभ होता है।

नारियल पानी- नारियल देवी लक्ष्मी का प्रतीक माना जाता है जिनका संबंध भगवान विष्णु से है इसलिए शिव जी को नहीं चढ़ता। शिव जी की पूजा नारियल से होती है लेकिन नारियल पानी से नहीं क्योंकि शिवलिंग पर चढ़ाई जाने वाली सारी चीज़ें निर्मल होनी चाहिए यानि जिसका सेवन ना किया जाए। नारियल पानी देवताओं को चढ़ाये जाने के बाद ग्रहण किया जाता है इसीलिए शिवलिंग पर नारियल पानी नहीं चढ़ाया जाता है।

शंख जल- भगवान शिव ने शंखचूड़ नाम के असुर का वध किया था। शंख को उसी असुर का प्रतीक माना जाता है जो भगवान विष्णु का भक्त था। इसलिए विष्णु भगवान की पूजा शंख से होती है शिव की नहीं। इस लिए हमेश ध्यान रखे कि शिव को जल अर्पण करते बक्त या फिर पूजन के समय शंख का इस्तेमाल शास्त्रों के अनुसार वर्जित है।

केतकी फूल- केतकी के फूल एक बार ब्रह्माजी व विष्णुजी में विवाद छिड़ गया कि दोनों में श्रेष्ठ कौन है। ब्रह्माजी सृष्टि के रचयिता होने के कारण श्रेष्ठ होने का दावा कर रहे थे और भगवान विष्णु पूरी सृष्टि के पालनकर्ता के रूप में स्वयं को श्रेष्ठ कह रहे थे। तभी वहां एक विराट लिंग प्रकट हुआ। दोनों देवताओं ने सहमति से यह निश्चय किया गया कि जो इस लिंग के छोर का पहले पता लगाएगा उसे ही श्रेष्ठ माना जाएगा। अत: दोनों विपरीत दिशा में शिवलिंग की छोर ढूढंने निकले।

छोर न मिलने के कारण विष्णुजी लौट आए। ब्रह्मा जी भी सफल नहीं हुए परंतु उन्होंने आकर विष्णुजी से कहा कि वे छोर तक पहुँच गए थे। उन्होंने केतकी के फूल को इस बात का साक्षी बताया। ब्रह्मा जी के असत्य कहने पर स्वयं शिव वहाँ प्रकट हुए और उन्होंने ब्रह्माजी की एक सिर काट दिया और केतकी के फूल को श्राप दिया कि शिव जी की पूजा में कभी भी केतकी के फूलों का इस्तेमाल नहीं होगा।

तुलसी दल- तुलसी को भगवान व‌िष्‍णु ने पत्नी रूप में स्वीकार क‌िया है। इसल‌िए तुलसी से श‌िव जी की पूजा नहीं होती। शिव पुराण के अनुसार जालंधर नाम का असुर भगवान शिव के हाथों मारा गया था। जालंधर को एक वरदान मिला हुआ था कि वह अपनी पत्नी की पवित्रता की वजह से उसे कोई भी अपराजित नहीं कर सकता है। लेकिन जालंधर को मरने के लिए भगवान विष्णु को जालंधर की पत्नी तुलसी की पवित्रता को भंग करना पड़ा। अपने पति की मौत से नाराज़ तुलसी ने भगवान शिव का बहिष्कार कर दिया था।