विधायकों का बाजार : बीजेपी के लिए कर्नाटक-एमपी जैसा नहीं है राजस्थान, जानिए क्यों ?

0
48

नई दिल्ली
राजस्थान में ताजा राजनीतिक हालात की तुलना मध्य प्रदेश और कर्नाटक से की जा रही है जहां कांग्रेस की सत्ता हिल गई। इन दोनों राज्यों में बीजेपी ने वापसी कर ली। लेकिन, राजस्थान में बीजेपी के लिए मध्य प्रदेश और कर्नाटक का वाकया दुहराना काफी मुश्किल साबित हो रहा है।

संख्या के खेल में राजस्थान अलग

दरअसल, मध्य प्रदेश में कांग्रेस और बीजेपी के विधायकों की संख्या में बहुत कम अंतर है जबकि राजस्थान में ज्यादा। राज्य की राजनीति के मंजे खिलाड़ी अशोक गहलोत को जब कुर्सी के लिए कुछ विधायकों की कमी पड़ी तो उन्होंने मायावती की बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) के विधायकों को तोड़ लिया। इस तरह, गहलोत कांग्रेस पार्टी के 107, निर्दलीय 13, भारतीय ट्राइबल पार्टी (बीटीपी) के 2 जबकि राष्ट्रीय लोक दल (आरएलडी) के 1 विधायक, यानी कुल 123 विधायकों के समर्थन से सरकार में आए। मुश्किल वक्त में उन्हें मार्क्सवादी कम्यूनिस्ट पार्टी (सीपीएम) के दो विधायकों का समर्थन भी मिलता है। इस तरह, उनकी कुल ताकत 125 विधायकों तक पहुंच गई।

पल-पल बदलता माहौल
हालांकि, सचिन पायलट की बगावत के बाद यह नंबर अब निश्चित नहीं रहा। वैसे तो विधायक दल की मीटिंग में 107 विधायकों की मौजूदगी का दावा किया जा रहा है, लेकिन यह भी तय है कि अगर पायलट खेमा पार्टी से अलग होकर मलाई पाने की गुंजाइश में दिखी तो कई विधायक गहलोत को अलविदा कह सकते हैं। गहलोत खेमे के कुछ विधायकों की नजर राजभवन पर भी टिकी होगी जो विधानसभा में बहुमत परीक्षण की मांग मान ले तो खेल बदल सकता है।

बीजेपी की राह की मुश्किलें
इन सबके के बीच बीजेपी को कितनी राहत मिल सकती है, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि पायलट आखिर में कितने विधायकों को अपने साथ ला सकेंगे। बीजेपी के इससे भी बड़ी मुश्किल है पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की सत्ता के प्रति घोर आग्रह और उनकी राजसथान की जनता के एक खास वर्ग में अच्छी पैठ।

कमजोर नहीं हैं गहलोत
राज्यसभा चुनावों में प्रदेश से कांग्रेस के दो उम्मीदवारों को 123 वोट मिले थे। दरअसल, एक मंत्री और सीपीएम के एक विधायक स्वास्थ्य कारणों से वोट नहीं दे सके थे। उधर, बीजेपी के दो कैंडिडेट को 74 वोट मिले थे जिनमें अपने 70 विधायक के अलावा नागौर से सांसद हनुमान प्रसाद बेनीवाल की पार्टी के तीन विधायकों के वोट शामिल थे। संकट काल में निर्दलीय विधायकों का पाला बदलना कोई बड़ी बात नहीं।

लेकिन, गहलोत ने राज्यसभा चुनाव में सभी को एकजुट रखकर पायलट को किनारे लगाने और कांग्रेस आलाकमान को यह संदेश देने में सफलता पाई थी कि राजस्थान में पार्टी को उनसे ज्यादा फायदा कोई नहीं दिला सकता है।