राजनीति

राहुल गांधी को ब्रिटेन के पूर्व पीएम से सीखना चाहिए, अगर बचानी है कांग्रेस तो…

कांग्रेस को क्या करना चाहिए ?

कांग्रेस को ब्रिटेन के पूर्व पीएम टॉनी ब्लेयर से सीखना चाहिए। 1979 से 1990 तक मार्गरेट थैचर और 90 से 97 तक जॉन मेजर के …कंजरवेटिव पार्टी के 18 साल के शासन को टॉनी ब्लेयर के नेतृत्व में लेबर ने चुनौती दी और 1मई 1997 को अपनी सरकार बनाई। निजीकरण, पूंजीवाद और अनुदारवाद के अनूठे मेल से बने थैचरवाद से जंग आसान नहीं थी। लेबर पार्टी पिछले चार चुनाव लगातार हारती आई थी।

देखा जाए तो टॉनी ब्लेयर के सामने राजनीति की चार अहम चुनौतियां थीं

1. ब्रिटेन में बीते चार चुनाव यानी 18 साल से थैचरवाद ( 1979-90- मार्गरेट थैचर, 1990-97 -जॉन मेजर) का युग चला आ रहा था। 1827 से अब तक ब्रिटेन की किसी पीएम ने मार्गरेट थैचर की तरह लगातार तीन चुनाव नहीं जीता था।
2. थैचरवाद में सरकार नियंत्रित कंपनियों के लिए कोई जगह नहीं थी। ब्रिटिश गैस, ब्रिटिश एयरवेज और ब्रिटिश टेलीकॉम का निजीकरण हो चुका था और ये कंपनियां मुनाफे में चल रही थीं।
3. ट्रेड यूनियनों की कमर टूट चुकी थी। सेकेंड वर्ल्ड वार के बाद से इनकम टैक्स की दर सबसे निचले स्तर पर थी। यानी मजदूर बेहाल थे और सारे बिजनेस घराने सरकार के साथ थे।
4. ब्रिटेन की जनता थैचर के इस बयान पर यकीन करने लगी थी कि “Labour isn’t working.”

जॉन स्मिथ की मौत के बाद जुलाई 94 में लेबर पार्टी की कमान 39 साल के ब्लेयर के हाथ में आई। ब्लेयर ने महज तीन साल में लेबर पार्टी का कायापलट कर दिया। लेबर पार्टी को अब तक समाजवाद, सरकार नियंत्रित पूंजीवाद और उदार सामाजिक राजनीतिक व्यवस्था के तौर पर देखा जाता था। ब्लेयर न्यू लेबर का मुहावरा लेकर आए। राजनीति की रेखा पर ब्लेयर ने लेबर को लेफ्ट की जगह काफी हद तक सेंटर पर पोजीशन किया । 18 साल के थैचरवाद ने ब्रिटेन में समाज की जगह चेतना से लैस व्यक्ति और परिवार को स्थापित कर दिया था। ब्लेयर ने थैचरवाद और ओल्ड लेबर को मिलाकर राजनीति का नया रसायन तैयार किया और इसे थर्ड वे का नाम दिया। इस थर्ड वे से थैचरवाद का लेबर को लेकर TINA -there is no alternative और TITA -there is terrible alternative- का दावा कमजोर पड़ गया । लेबर का नारा- हर नागरिक को समान हक और समान मौका लोगों की जुबान पर चढ़ गया।
नतीजा 18 साल के बाद लेबर पार्टी एक बार फिर सत्ता में आई।

ब्लेयर की ये जीत कितनी बड़ी थी-
1. मई 1997 में टॉनी ब्लेयर के नेतृत्व में लेबर ने जो चुनाव में जीत हासिल की, वो उसके चुनावी इतिहास की सबसे बड़ी जीत है।
2. ब्लेयर को हाउस ऑफ कामन्स में 179 सीट की मेजोरिटी हासिल थी जो लेबर के इतिहास में तो सबसे बड़ी बढ़त थी ही ब्रिटेन में 1935 के बाद से किसी पार्टी को इतनी बड़ी बढ़त हासिल नहीं हुई थी।
3. 43 साल के ब्लेयर जब पीएम बने तो 1812 के बाद से ब्रिटेन के वो अब तक के सबसे युवा पीएम थे।

अब समझने वाली बात ये है कि ब्लेयर की राजनीति से कांग्रेस क्या सीख सकती है।

1. पार्टी नए नेता का चुनाव करे। 2014 और 2019 का सबक ये है कि पार्टी जिस गांधी परिवार को अपनी हरेक परेशानी के समाधान के तौर पर देखती आई है, दरअसल वही उसकी सबसे बड़ी समस्या है। पार्टी को गांधी परिवार और उनके पसंदीदा दरबारियों से अलग लोकतांत्रिक तरीके से फौरन एक नया नेतृत्व तलाश करना चाहिए ।

2. बीते पांच सालों में सॉफ्ट हिन्दुत्व के नाम पर बीजेपी की देखादेखी कांग्रेस सेंटर से सेंटर राइट की ओर शिफ्ट करती नजर आई है। पार्टी को समझना होगा कि मोदी युग की चुनौती का सामना करना है तो उसे सेंटर लेफ्ट में शिफ्ट करने की जरूरत है। सेंटर लेफ्ट का मतलब है – पहले सेंट्रिस्ट पार्टी के तौर पर अपनी परंपरागत पोजिशन को रीगेन करना और कमजोर हो चुके लेफ्ट और रिजनल पार्टीज ने जो राष्ट्रीय राजनीति में जमीन खोई है उस पर अपना दावा जताना। वोट बैंक पॉलिटिक्स के नजरिए से कहा जाए तो इसका मतलब है माइनोरिटीज, राज्य और लेबर के हक की आवाज बुलंद करना।

3. संसदीय राजनीति की जगह सड़क की राजनीति करना – पार्टी को चाहिए कि वो टीवी डिबेट की राजनीति से पूरी तरह गुम हो जाए। संसद में बीजेपी को जितने आर्डिनेंस को कानून बनाना है उसे बनाने दें। अपने विरोध को संसद के बार-बार बहिष्कार के तौर पर महज सांकेतिक तौर पर जताएं और आम जनता के मुद्दों पर खास कर दक्षिण भारत के राज्यों की सड़कों पर अवाम को गोलबंद करने की राजनीति करे। बाई डिफॉल्ट जनता को ये संदेश मिलेगा कि अगर आप संसद में मजबूत विपक्ष नहीं भेजेंगे तो इसका नतीजा यही होगा कि सरकार मनमाने तौर पर काम करेगी और लोकतंत्र की परंपरा की धज्जियां उड़ाएगी।

4. सड़कों की राजनीति महज एक शुरूआत है, पार्टी की सबसे बड़ी चुनौती है नए युग के लिए राजनीति के नए मुहावरे, प्रतीक और बिंबों की तलाश करना। परंपरागत राजनीति से पार्टी अपनी खोई पहचान हासिल नहीं कर सकती। चौकीदार चोर है कहना काफी नहीं है। अवाम के मुद्दों को उठाने और सरकार के खिलाफ विरोध जताने के लिए – लगे रहो मुन्नाभाई के गेट वेल सून वाले बुके पेश करने जैसे नए अनूठे तरीके तलाशने की जरूरत है।

5. मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ का सबक ये है कि राज्य के चुनाव में स्थानीय मुद्दे हावी रहते हैं। अगर पार्टी मजबूती से अवाम के मुद्दों को उठाती है तो महाराष्ट्र, हरियाणा, झारखंड और जम्मू कश्मीर के एसेंबली चुनाव में पार्टी बेहतर कर सकती है।

नया नेतृत्व नई पहचान बना सकता है, नई पहचान से साख बनेगी और साख से अवाम का भरोसा हासिल करने में मदद मिलेगी।

ये लेख वरिष्ठ पत्रकार आशीष झा के फेसबुक पेज से साभार लिया गया है। ये लेखक के निजी विचार हैं।

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