‘ये देश एक रंगमंच और माइक लिए खड़े हैं पीएम, लेकिन 2 मिनट वाली मैगी नहीं हैं वेंटीलेटर्स’

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ये देश एक रंगमंच है, जिसपर माइक लिए एक प्रधानमंत्री खड़ा है। उसके भोंपू की आवाज इतनी ऊंची है कि बाकी सभी तार्किक आवाजें शुन्न पड़ जाती हैं. प्रधानमंत्री ने वेन्टीलेटरों, प्रोटेक्टिव किट और टेस्ट किट के लिए 15 हजार करोड़ रुपए का एलान किया है। भक्तजनों ने तालियां पीट दीं। जनस्वास्थ्य के सबसे बड़े शुभचिंतक के रूप में प्रधानमंत्री के चेहरे वाली फ़ोटो लिए एंकर आपके कानों में चीखेगा।

लेकिन इस घोषणा से ही इस देश में ‘हेल्थ फेलियर’ की जिम्मेदारी से प्रधानमंत्री को मुक्त कर देने वाले इस देश के असल अपराधी हैं। वेंटीलेटर्स, पारले जी का बिस्किट नहीं, जो दुकान पर तैयार किए हुए मिल जाते हैं. आप कब समझेंगे कि यकायक की गई घोषणा, किसी भी काम की इतिश्री नहीं होती, बल्कि अपनी असफलता को छुपाने के लिए वित्तीय गिटार की तरह काम करती है. जिसके संगीत में असल दुनिया की हकीकत छुप जाती है.

प्रधानमंत्री के लच्छेदार भाषण पर विश्वास करने से पहले वेंटीलेसर्स को लेकर भारत की स्थिति क्या है ये जान लीजिए. वेन्टीलेटर्स के सेंसर्स, चिप्स, सेमी कंडक्टर फैब्रिफिकेशन से लेकर माइक्रो कंट्रोलर जैसे महत्वपूर्ण कंपोनेंट्स चीन से आते हैं. वेन्टीलेटर्स के निर्माण के लिए भारत पूरी तरह चीन पर निर्भर करता है। इंटरनेशनल फ्लाइट्स पर प्रतिबंध के कारण चीन से सामान मंगाना फिलहाल एकदम असंभव है। भारत में कुछेक कम्पनियां ही वेन्टीलेटर्स बनाने का काम करती हैं, जोकि सरकारी मदद नाम के टेकुए पर टिकी हुई हैं. ये गिनी-चुनी कम्पनियां भी चाइना से आयातित कम्पोनेंट्स से वेन्टीलेटर्स मैन्युफैक्चर करती हैं.

साफ है आवश्यक वेन्टीलेटर्स तैयार कर पाना तुरंत एकदम भी सम्भव नहीं है. आप 15 हजार की घोषणा कर दीजिए चाहे 50 अरब की. इसमें महीनों का समय लगना तय है। वेन्टीलेटर्स कोई मैगी नहीं है. अब सवाल ये है कि आज जबकि वैश्विक महामारी पूरे देश को लीलने के लिए खड़ी हुई है। तब एक सवाल उठना लाज़िम है कि अबतक सरकार क्या कर रही थी?

30 जनवरी को भारत में कोरोना के पहले मरीज की खबर आ चुकी थी। इससे पहले ही दुनिया भर से इस वैश्विक आपदा की तस्वीरें आ चुकी थीं, आज यानी 24 मार्च को जाकर भारत में वेन्टीलेटर्स बनाने के लिए घोषणा हुई है। इस Health system की इस फेलियर किसे जिम्मेदार माना जाएगा? कोई प्रधानमंत्री से पूछेगा दो महीने से क्या कर रहे थे, पिछले 6 साल में वेन्टीलेटर्स के लिए क्या किया? हेल्थ सिस्टम के लिए क्या किया?

मुझे मालूम है कोई जबाव देने वाला नहीं है, क्योंकि ये देश एक रंगमंच है, जिसपर माइक लिए एक प्रधानमंत्री खड़ा है।

(यह लेख श्याम मीरा सिंह के फेसबुक वॉल से साभार लिया गया है)