यूरोप कब का चीन को हमेशा के लिए डंप कर चुका है, अब वह चीन के साथ बस खेल कर रहा है

0
58

कोरोना, दक्षिण चीन सागर में आक्रामकता, बॉर्डर विवाद, ऋण जाल’ ये वो कारण हैं जिससे आज दुनियाभर के देश परेशान हो चुके हैं। इन सभी को अंजाम देने वाला एक ही देश है और वह चीन। चीन अभी तक एशिया से लेकर प्रशांत क्षेत्र और ताइवान से लेकर अमेरिका,यूरोप तक दुनिया के लगभग सभी देशों को दुश्मन बना चुका है।

लेकिन यूरोपीय यूनियन का क्या? क्या वह भी भी चीन का का साथ दे रहा है?

हालांकि, बीजिंग ऐसा चाहता है परंतु अब यूरोपीय संघ ने वास्तव में चीन को डंप करने का फैसला कर लिया है। अगर व्यावसायिक सम्बन्धों में देखा जाए तो यूरोपीय संघ जिस तरह से चीन के साथ टालमटोल कर रहा है वह चीन के साथ संबंधों को दरकिनार करने का पहला कदम है।

आखिर EU कैसे चीन को दरकिनार करने की कोशिश कर रहा है?

दरअसल, 14 सितंबर को चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग और यूरोपीय नेताओं के बीच के एक वर्चुअल शिखर सम्मेलन होने वाला है। चीन की उम्मीद है कि EU-China investment agreement के ऊपर EU चीन को नए मौके देगा परंतु ऐसा लग रहा है कि EU के पास चीन के के लिए कोई वास्तविक योजना नहीं है।

यूरोपीय संघ की चीन के साथ मुक्त व्यापार समझौते जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर विचार करने की योजना है, लेकिन वह चीन के सामने मुश्किल मांगे भी रख सकता है जैसे फ्री ट्रेड ऐग्रीमेंट की शर्ते और चीनी बाजार में यूरोपीय कंपनियों के अधिक पहुंच देने की।

एक तरह यूरोपीय यूनियन के व्यापारिक निकाय चीन के साथ बातचीत की योजना बना रहे हैं, वहीं दूसरे तरफ यूरोपीय संघ की दो प्रमुख शक्तियां- फ्रांस और जर्मनी, Indo-Pacific क्षेत्र में भारत केन्द्रित योजना बना रहे हैं, जो बीजिंग की महत्वाकांक्षाओं के खिलाफ है। वहीं अन्य यूरोपीय देश भी चीन द्वारा किए जा रहे मानवाधिकारों के उल्लंघन और आक्रामकता की आलोचना कर रहे हैं।

ऐसे में अगर यह कहा जाए कि EU अपनी की शर्तों पर चीन को कार्रवाई करने के लिए दबाव डाल रहा है तो यह गलत नहीं होगा। यानि अगर चीन 14 सितंबर को होने वाले शिखर सम्मेलन के बाद EU के साथ एक सार्थक संबंध रखना चाहता है तो उसे EU की बात माननी होगी।

यूरोपीय संघ ने पहले ही चीन के साथ बिगड़ते व्यापारिक संबंधों के संकेत दिए हैं। उदाहरण के लिए, चीन की यूरोपीय चैंबर ऑफ कॉमर्स की वार्षिक रिपोर्ट ने चेतावनी दी है कि यूरोप-चीन के तनाव के बीच चीन में स्थित यूरोपीय कंपनियां कम्युनिस्ट सरकार की “मनमानी सजा” से डर रही हैं।

वार्षिक रिपोर्ट में आगे दावा किया गया है कि अब यूरोपीय कंपनियों को यह लगता है कि यूरोप के देशों द्वारा लगातार चीन के शिनजियांग और हांगकांग में मानवाधिकार उल्लंघन जैसे मुद्दों पर बोलने के कारण उन्हें चीन में नुकसान उठाना पड़ सकता है।

इस प्रकार से यह स्पष्ट है कि अब यूरोप इस कम्युनिस्ट सत्तावदी देश के साथ द्विपक्षीय व्यापार संबंधों को कम करने की कोशिश कर रहा है। यूरोप के देश अब चीन के खिलाफ किसी भी चीज को हथियार बनाकर चीन के खिलाफ दबाव बना रहे हैं।

जिस तरह से चीन अपनी जोड़-तोड़ वाली आर्थिक नीतियों से अन्य देशों को अपने जाल में फँसाता है वैसे में चीन के खिलाफ कई मामले मिल सकते हैं,जहां EU चीन को घेर कर अपनी शर्तों को मनाने का दबाव बना सकता है।

यूरोपियन चैंबर ऑफ कॉमर्स भी चीन को अपनी कंपनियों को सब्सिडी न देने और निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा सुनिश्चित करने की मांग कर रहा है। यह प्रमुख संस्था यह भी चाहती है कि चीन अपने FDI नियमों को हल्का करे क्योंकि चीनी अर्थव्यवस्था के कई क्षेत्रों में विदेशी कंपनियों पर प्रतिबंध लगा हुआ है।

चीन में यूरोपीय संघ के राजदूत, Nicolas Chapuis ने चीनी बाज़ारों में व्याप्त भेदभाव को दर्शाते हुए कहा था, “हमें वास्तविकता और वादों के बीच के अंतर को समाप्त करना होगा।” उन्होंने सवाल किया कि, “क्यों हुवावे की यूरोप के बाज़ारों में 40 प्रतिशत हिस्सेदारी है … और क्यों दो यूरोपीय 5G कंपनियों एरिकसन और नोकिया की चीन के बाजार में केवल 11 प्रतिशत हिस्सेदारी है? आखिर समस्या क्या है?”

चीन में यूरोपीय व्यवसायों के लिए बराबरी की ये मांगें चीन की वर्चस्वता को एक प्रकार से चुनौती है। यूरोपीय चैंबर ऑफ कॉमर्स के अध्यक्ष ने खुद चीन की कम्युनिस्ट सरकार को चेतावनी दी है कि 14 सितंबर का शिखर सम्मेलन एक निवेश और व्यापार समझौते करने का आखिरी मौका है। यह भी तय है कि चीन कभी अन्य देशों के लिए अपना मार्केट नहीं खोलने वाला है।

हालांकि, यूरोपीय संघ ने चीन पर अपने दरवाजे स्पष्ट रूप से बंद नहीं किए हैं, लेकिन इससे चीन को एक भयंकर झटका लगा है। एक तरफ दुनिया में बहिष्कार झेल रहा चीन व्यापार सौदा करने के लिए बेताब है, तो वहीं EU उसके सामने ऐसी मांग रख रहा है जो कम्युनिस्ट चीन की पूंजीवादी आर्थिक मॉडल को नष्ट कर सकता है।

इसके अलावा, अमेरिका की भी नजर EU और चीन के साथ होने वाले इस डील पर है। अगर यूरोपीय संघ बीजिंग को अपनी शर्तों पर मनवा लेता है तो  ट्रम्प प्रशासन भी चीन से इसी तरह की की मांग करने से पीछे नहीं हटेंगे।

यदि चीन यूरोपीय संघ द्वारा तय की जा रही शर्तों पर हस्ताक्षर नहीं करता है, तो ब्रसेल्स चीन के साथ एक मुक्त व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर नहीं करेगा। इसके अलावा, ब्रसेल्स से ऐसे संकेत मिल रहे हैं कि अगर चीन और यूरोपीय संघ से व्यापार संबंधों का विस्तार करना है तो यह अभी ही करना होगा जब जर्मनी की चांसलर एंजेला मर्केल यूरोपीय संघ की वास्तविक नेता हैं।

एक बार मर्केल के सत्ता से बाहर हुई तो उसके बाद, यूरोपीय संघ में कोई भी नेता यूरोपीय संघ को चीन के साथ नीतियों पर सभी देशों को एक साथ लाने में सक्षम नहीं होगा। जर्मनी की चेयरमैनशिप अगले साल जनवरी में समाप्त होने जा रही है और मर्केल खुद अगले साल जर्मन चांसलर के पद से हटने जा रही हैं। मर्केल के सत्ता से बाहर होने के बाद कोई भी चीन की परवाह नहीं करेगा।

हालाँकि, अभी भी चीन और यूरोपीय संघ के निवेश सौदे की कोई संभावना नहीं है। चीन ने ब्रसेल्स के साथ अपने व्यापारिक संबंधों को औपचारिक रूप देने का अंतिम अवसर खो दिया है। इससे यह कहना गलत नहीं होगा कि यूरोपीय संघ ने अपने Delay Tactic से चीन को अब वास्तविक रूप से डंप कर दिया है।