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भाजपा-शिवसेना गठबंधन से एक सवाल- ‘क्या ये पवित्र रिश्ता है?’

एक लंबे समय से चले आ रहे आरोप प्रत्यारोप के दौर के बाद आखिरकार दो पुराने साथी एक बार फिर साथ आ गये हैं। हम बात कर रहे हैं एनडीए के दो प्रमुख घटक बीजेपी और शिव सेना की। आगामी लोकसभा चुनाव को ध्यान मे रखते हुए दोनों दलों ने 18 फरवरी की शाम गठबंधन की घोषणा कर दी है। इसी बीच मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने बीजेपी पर निशाना साधते हुए गठबंधन पर कई सवाल उठाए हैं ।कांग्रेस ने पूछा है कि क्या गठबंधन का यह रिश्ता पवित्र है? क्या बीजेपी और शिवसेना का गठबंधन राजनीति से प्रेरित नहीं है? क्या आप राजनीतिक मिलावट नहीं कर रहे हैं?

दरअसल सात फरवरी को संसद के बजट सत्र के आखिरी दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विपक्षी पार्टियों की गठबंधन की रणनीति पर तंज कसते हुए कहा था कि विपक्ष का गठबंधन एक महामिलावट है, जिसे जनता चुनाव में खारिज कर देगी। कांग्रेस की और से उठाये गये सवाल उसी संदर्भ में है। इस बाबत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोमवार को ट्वीट कर भाजपा-शिवसेना को गठबंधन की बधाई दी। साथ ही उन्होंने कहा कि भाजपा-शिवसेना महाराष्ट्र की भलाई के लिए काम करना जारी रखेंगी। हालांकि पिछले 5 साल में भाजपा और शिवसेना के संबंधों मे काफी खटास आयी है।

शिवसेना राम मंदिर, कश्मीर और राफेल मुद्दे को लेकर भाजपा पर कई बार निशाना साध चुकी है। खुद शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे भी बार बार सार्वजनिक मंचों पर बीजेपी की आलोचना करते रहे हैं। उनके बयानों से लगता है कि मानो उनका इरादा बदल गया है और इस चुनाव में शिवसेना भारतीय जनता पार्टी से किनारा कर लेगी लेकिन चुनाव नज़दीक आते-आते शिवसेना भारतीय जनता पार्टी से हाथ मिला लेती है। साल 2014 में शिवसेना और बीजेपी के बीच आपसी मतभेद खुलकर सामने आए थे। शिवसेना सरकार महाराष्ट्र में हमेशा से ही खुद को बीजेपी का बड़ा भाई बताती आई है।लेकिन 2014 मे शानदार जीत के बाद बीजेपी खुद को बड़े भाई के रूप मे देख रही थी।

इसके चलते दोनों दलों ने महाराष्ट्र विधानसभा का चुनाव अलग-अलग लड़ा था। उस वक्त बीजेपी ने 288 विधानसभा सीटों में से 260 पर प्रत्याशी उतारे थे। हालांकि इसके पहले बीजेपी प्रमुख अमित शाह ने जनवरी 2019 में कहा था कि अगर आगामी लोकसभा चुनावों से पहले बीजेपी और शिवसेना का गठबंधन नहीं होता है तो हम महाराष्ट्र में शिवसेना को हरायेंगे। इस पर शिवसेना ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की थी। जिस के दोनों दलों के बीच गठबंधन की संभावनाएं काफी कम रह गयी थीं।

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