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पीएम से 1 सवाल: कब नहीं थी सेना को आतंकियों से निपटने की ‘खुली छूट’ ?

पुलवामा आतंकी हमले से देश वैसे ही आक्रोशित है जैसे उरी, नागरोटा और पठानकोट जैसे हमलों के बाद था। संसद पर हमला, मुंबई में आतंकी हमले और करगिल युद्ध के वक़्त भी तो देश कमोबेश ऐसे ही आक्रोश में नज़र आया था। तो फिर इस बार अलग क्या है? इस बार फ़र्क़ सिर्फ़ इतना दिख रहा है कि पाकिस्तान को सबक़ सिखाने का सारा दारोमदार सेना पर छोड़ दिया गया है! ख़ुद प्रधानमंत्री ने सेना को ‘पूरी स्वतंत्रता’ दे दी है।

प्रधानमंत्री ने ऐसा क्यों किया? क्या सेना अबकी बार पाकिस्तान का ‘पूरा इलाज’ कर देगी? क्या जो ‘छूट’ मोदीजी ने अब सेना को दी है, वह उसके पास पहले नहीं थी? क्या अभी तक सेना सचमुच ‘पूरी स्वतंत्रता’ के लिए तरस रही थी? कुछ नहीं कर पा रही थी?  क्या कश्मीर समस्या सिर्फ़ एक सैनिक चुनौती है? क्या कश्मीर समस्या का सम्बन्ध आन्तरिक और वैश्विक राजनीति, विदेश नीति और आर्थिक मज़बूती से नहीं है? क्या पाकिस्तान पर हमला कर देने से, उसे एक बार और हरा देने से कश्मीर समस्या का हल निकल आएगा?

दरअसल सेना को खुली छूट देने की बात कह कर नरेंद्र मोदी एक तीर से कई राजनीतिक निशाने साध रहे हैं! बीते कई वर्षों में अकसर सेना के कुछ अफ़सर ऐसे दावे करते रहे हैं कि अगर उनके ‘हाथ बँधे’ न होते तो उन्होंने जाने क्या-क्या कर दिया होता! ज़ाहिर है कि इन अफ़सरों का इशारा उनके समय के राजनीतिक नेतृत्व की तरफ़ होता रहा है कि उसने उन्हें ऐन उस समय अपने हाथ खींच लेने को कह दिया और ऐसा तब जब वह पाकिस्तान को बहुत तगड़ी ‘चोट’ देने के क़रीब थे।

अब अगर नरेंद्र मोदी ज़ोर-शोर से सेना को ‘खुली छूट’ देने की बात करते हैं, तो वह परोक्ष रूप से यह ‘स्थापित’ करना चाहते हैं कि पिछली तमाम सरकारों में ‘साहस की कमी’ थी, इसलिए उन्होंने सेना को वह नहीं करने दिया, जिसमें सेना ‘सक्षम’ थी!

ज़ाहिर है कि चुनावी मौसम में ऐसा तीर मोदी और बीजेपी को बड़ा फ़ायदा पहुँचा सकता है! और नरेन्द्र मोदी तो अभी से ही अपनी सभाओं में पुलवामा हमले को चुनावी रंग देने ही लग गए हैं! दूसरी बात यह कि बीते 5 साल से जारी मोदी सरकार की कश्मीर नीति की विफलताओं पर पर्दा डालने में यह क़दम प्रधानमंत्री के लिए बड़ा सुविधाजनक उपाय भी हो सकता है! यानी अब आतंकवाद और पाकिस्तान का इलाज सेना को ही करना है, राजनीतिक सत्ता को नहीं!

सवाल यह है कि सेना को किस बात की छूट है? कश्मीर से सारे के सारे आतंकवादियों के पूरे सफ़ाये की या सीमा पार चल रहे आतंकी ठिकानों पर हमला बोल देने की या पाकिस्तान के ख़िलाफ़ युद्ध छेड़ देने की? इसका जवाब स्पष्ट नहीं है। सेना को अगर कश्मीर के भीतर के आतंकवाद से निपटने की ‘खुली छूट’ है, तो वह क्या तरीक़े अपनाएगी? इस ‘खुली छूट’ में सेना जो करेगी, उसका ठीकरा किसके सिर फूटेगा? किस पर उँगलियाँ उठेंगी? सेना पर ही न! और सेना अपना मुँह नहीं खोल सकती। उसे सार्वजनिक रूप से बयान देने का हक़ नहीं है। उस पर ‘अनुशासन’ की तलवार लटकती रहती है।

सेना यह नहीं बता सकती कि उसके पास कितने सीमित संसाधन हैं? बाक़ी देश को तो पता ही है कि सेना में अफ़सरों, गोला-बारूद और अन्य साज़ो-सामान की भारी किल्लत है। यही है तेज़ी से कड़े फ़ैसले लेने वाली मज़बूत सरकार का सबसे बड़ा फ़ैसला। अब बताइए कि क्या 70 सालों में कभी किसी सरकार ने इतना बड़ा फ़ैसला पहले कभी लिया है? यदि नहीं, तो आपके पास ‘मोदी-मोदी-मोदी’ की नारेबाज़ी करने के सिवाय सिर्फ़ एक ही विकल्प है कि आप आगामी आम चुनावों में अपना फ़ैसला सुनाएँ।

स्रोत- सत्यहिंदी डॉट कॉम

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