दिल्ली के चुनावी नतीजों ने बताया, क्या होता है सबका साथ और सबका विकास

0
131

विकास का मतलब ऊंची बिल्डिंगें बनाना नहीं होता. उत्सव में डूबी चमचमाती सड़कें बनाना भी नहीं जिन पर बेरोजगारों की लंबी कतारें हों. विकास के मायने एजेंडे भरे भी नहीं होते कि उनके बूते सत्ता सियासत साधती रहे.

बयानवीरों के चमचमाते बयान भी विकास को जस्टीफाई नहीं करते.

दरअसल, विकास वाले जानते हैं कि शाइनिंग इंडिया को भारत ने एक बार नकार दिया था.

बहरहाल, दिल्ली के चुनावी नतीजे बता रहे हैं कि सबका साथ और सबका विकास क्या होता है. बिजली-पानी, सड़क, अच्छी और बेहतर स्वास्थ्य- शिक्षा सुविधाएं यही विकास के मानक हैं। वो बयान नहीं जो चमकते हुए कोई प्रवक्ता बुद्धु बक्से से उठाकर आपके माथे पर चिपका देता है और आप उसे लेकर घूमते रहते हैं।

जाइए दिल्ली के मोहल्लों और कॉलोनियों में जहां मोहल्ला क्लिनिक के आगे खड़ी कतारें आपसे कुछ कहना चाहती हैं। ऊंची साफ-सुथरी स्कूल की इमारतें और उनसे बाहर आता पहाड़ों का कोरस आपके कान में विकास के नये गीत घोलता है, उन पार्कों में जाइए जहां फिसलपट्टियों से खेलते बच्चों की आवाजें और झूला झूलती बच्चियों का कर्णप्रिय शोर एक नई कहानी गढ़ रहा है।

असहमतियां हैं और बनी ही रहती हैं। लेकिन सरकार से सुविधाएं मुफ्त मिले तो लोड मत लीजिए। ये देश को संकट में नहीं डालेगा। ना ही राजकोष का घाटा बढ़ाएगा। कल्याणकारी राज्य की स्थापना के बारे में सोचिएगा।

फिलहाल, अरविंद केजरीवाल सरकार की ये वापसी के कई दूरगामी संकेत हैं।

अब जितने चाणक्य जिस-जिस पार्टी में हैं संभवतः उन्हें समझ आ रहा होगा कि सत्ता का हर रास्ता एक जैसा नहीं होता।

नोट- ये लेख पत्रकार सारंग उपाध्याय की फेसबुक वॉल से साभार लिया गया है। ये लेखक के निजी विचार हैं।