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तीन तलाक पर कानून के बहाने, शाहबानो केस का छुपा सच भी जान लीजिए

जब भी मुस्लिम महिला की बात आती है , शाहबानो सबको याद आने लगती हैं। क्युँ याद आने लगती हैं ? क्युँकि उन्होंने निज़ी खुन्नस के कारण इस देश में पहली बार शरियत को चुनौती दी थी।

शाहबानो इसीलिए संघी सोच के लोगों की पसंदीदा किरदार हैं और ऐसे ही तमाम सवाल आज ट्रिपल तलाक बिल पर चर्चा के समय सरकारी पक्ष के हर लोगों की ज़बान पर था और “शाहबानो” प्रकरण खूब उछला।

खलिहर और गुमनामी की ज़िन्दगी जी रहे “आरिफ मोहम्मद खान” प्रधानमंत्री के एक भाषण के कारण चर्चा में आ गये और तमाम टीवी चैनलों पर इस्लाम में सुधार का प्रवचन देने लगे। वह इस्लाम जिसे पूरी दुनिया में 200 करोड़ लोग बिना इफ और बट के मानते हैं उस इस्लाम को आरिफ मुहम्मद खान जैसे दो टके के नास्तिक सुधारने चले हैं। तो उसकी वजह है “शाहबानो”।

क्या मामला है शाहबानो का ? इसका दूसरा सच देखिए

इंदौर की रहने वाली “शाहबानों” अपने पति और इंदौर के नामी एडवोकेट “मोहम्मद अहमद खान” की दूसरी पत्नी थीं , अर्थात वह खुद एक महिला का पति और सुखचैन छीन कर अपने पति की दूसरी पत्नी बनी थीं। वह मोहम्मद अहमद खान की कज़िन भी थीं और विवाह के बाद सालों साल एक ही घर में मोहम्मद अहमद खान और उनकी दोनों पत्नियाँ साथ ही साथ रहती थीं।

सन 1978 में जब शाहबानो 62 साल की हो गयीं तो अपने 80 साल के पति मोहम्मद अहमद खान से संबन्ध तनावपुर्ण हो गये , इसका कारण दोनों सौतनों और सौतेले भाईयों में लड़ाई थी।

तब शाहबानो के 80 साल के वृद्ध पति “मोहम्मद अहमद खान” ने बगल के अपने एक और घर में शाहबानो और उनकी बालिग 5 औलादों सिद्दीका , फातिमा , हमीद , जमील तथा एक और जिनका नाम पता नहीं” के साथ अलग रहने का प्रबंध कर दिया।

इसके बावजूद सौतिया डाह के कारण शाहबानो के अपने पति से संबन्ध नहीं सुधरे ,और शाहबानों अपने पति को लगातार प्रताणित करती रहीं।

और फिर इसी घरेलू कलह के कारण “बहरीन” से कानून की डिग्री हासिल करके उच्चतम न्यायालय तथा उच्च न्यायालय में वकालत करने वाले इंदौर शहर के एक इज्ज़तदार वकील ने अपनी दूसरी पत्नी “शाहबानो” को तलाक दे दिया।

वैवाहिक संबन्धों में कड़वाहट के इस स्तर पर आ जाने के बाद शाहबानो ने अपने पति को चेतावनी दी कि ‘

“वक़ील साहब, अगर मैं अदालत चली जाऊंगी तो आप कभी भी अपना काला कोट नहीं पहन पाएंगे”

अब यहाँ ध्यान देने वाली बात यह है कि उस समय शाहबानो की पाचों औलादें बालिग थीं , सिद्दीका , फातिमा , हमीद , जमील की तो शादी भी हो चुकी थी। तो इस्लाम के अनुसार “शाहबानो” की देखरेख उनकी औलादों पर फर्ज़ था ना कि पूर्व पति का और वह देख रेख कर भी रहे थे। शाहबानो का मुकदमा तो केवल अपने पति को सबक सिखाने का मुकदमा था। जिससे इस्लाम और शरियत पर न्यायालय को हस्तक्षेप करने का मौका मिल गया।

इंदौर की निचली अदालत में “मोहम्मद अहमद खान” मुकदमा हार गये और अदालत ने शाहबानो को ₹25 गुज़ारा भत्ता देने का आदेश दिया , इसके खिलाफ जबलपुर हाइकोर्ट में “मोहम्मद अहमद खान” ने अपील की तो हाईकोर्ट ने यह राशि बढ़ा कर ₹125 कर दी , “मोहम्मद अहमद खान” ने इसके विरुद्ध उच्चतम न्यायालय में अपील की और 23 अप्रेल 1985 को उच्चतम न्यायालय ने गुजारा भत्ता की राशि ₹200 बढ़ाकर शाहबानो के हक में फैसला देते हुए “शरियत” में दखल देने की अपनी सालों पुरानी हसरत पूरी कर दी।

शाहबानो के पति मुहम्मद अहमद खान केस हार गये और फिर उन्होंने कभी अपना काला कोट नहीं पहना, अर्थात वकालत छोड़ दी। इस फैसले के ठीक 6 साल बाद 94 वर्ष की उम्र में “मोहम्मद अहमद खान” की मृत्यु हो गयी।

यह मुकदमा गुज़ारे भत्ते का मुकदमा था ही नहीं बल्कि यह मुकदमा “अना” का मुकदमा था जिसमें पूर्व पत्नी से हार के बाद मोहम्मद अहमद खान ने वकालत ही छोड़ दी।

अब “शाहबानो” के गुज़ारे भत्ते के संदर्भ में दो बातें

इस्लाम में विधवा या तलाकशुदा से विवाह को पुण्य का कार्य बताया गया है इसलिए सदैव ही ऐसा होता है कि शादी की उम्र यदि होती है तो ऐसी औरतों का पुनः विवाह हो जाता है इसलिए गुजारा भत्ता की इस्लाम में व्यवस्था नहीं है । और शाहबानो जैसे बूढ़े लोगों के लिए इस्लाम में उनकी औलादों पर माँ की खिदमत फर्ज़ बता कर उनको यह ज़िम्मेदारी दी गयी है , और सबसे अच्छी बात यह थी कि शाहबानो की औलादें यह ज़िम्मेदारी उठा रही थीं फिर भी उनको अपने 94 वर्षीय पति से गुज़ारा भत्ता चाहिए था।

दरअसल गुज़ारा भत्ता तो उस स्थीति में दिया जाना चाहिए जिसमें तलाकशुदा को बदचलन , कुलटा , कुललक्षीणी कहा जाता है , विधवा को मनहूस , अभागन , डाइन और पतिखोर कहकर उसके दूसरे विवाह की संभावना समाप्त कर दी जाती है और वह बेसहारा हो जाती है।

शाहबानो बेसहारा नहीं थी , उसके 5 बालिग बच्चे उसके सहारा थे और वह अपने 94 वर्षीय वृद्ध पति से गुजारा भत्ते के नाम पर सौतिया डाह के कारण बदला ले रही थी। शाहबानो को गुज़ारा भत्ता जीवन जीने के लिए नहीं बल्कि अपने पति मोहम्मद अहमद खान के वकालत की कोट उतराने के लिए चाहिए था।

बहरहाल , उच्चतम न्यायालय के फैसले के बाद शाहबानो ने गुजारा भत्ता लेने से इंकार कर दिया था , तो कारण स्पष्ट है कि उनको उसकी ज़रूरत ही नहीं थी।

ये लेख स्वतंत्र लेखक मोहम्मद जाहिद के फेसबुक पेज से साभार लिया गया है। ये लेखक के निजी विचार हैं।

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