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जनआंदोलन से पैदा हुई कांग्रेस भूल गई है जनआंदोलन करना, बैठे रहो और खत्म होते रहो

काँग्रेस लोकसभा चुनाव में हुई हार पर मंथन कर रही है। राहुल गाँधी “कोपभवन” में हैं , और प्रियंका गाँधी तथा ज्योतिरादित्य सिंधिया कार्यकर्ताओं और काँग्रेस पदाधिकारियों से मिल कर हार का कारण ढूँढ रहे हैं। वैसे यह समझ से बाहर की चीज़ है कि स्पष्ट से दिख रहे कारण को ढूढने के लिए इतनी मशक्कत क्युँ की जा रही है ?

2014 से फरवरी 2019 तक मुर्दा पड़ी काँग्रेस मात्र 2 महीने में सक्रिय होकर देश की 542 लोकसभा चुनाव जीतने का सपना यदि देख रही है तो फिर तो काँग्रेस को गाँधी जी की इच्छानुसार समाप्त ही कर देना चाहिए। 2019 लोकसभा चुनाव हारने का कारण स्पष्ट है कि जनआंदोलन से पैदा हुई “काँग्रेस” जनता के मुद्दों पर जनआंदोलन करना भूल गयी। जनआंदोलन से ही जनसमर्थन मिलता है , कार्यकर्ता मिलते हैं , संगठन बनता और मजबूत होता है। और उसका उदाहरण है अन्ना आंदोलन , जिसके फलस्वरूप बने वातावरण का लाभ उठाकर मोदी और भाजपा 2014 में सत्तासीन हो गये।

काँग्रेस की हार प्रत्याशियों , कार्यकर्ताओं और निचले श्रेणी के पदाधिकारियों के कारण नहीं बल्कि काँग्रेस के उच्च स्तर के नेताओं , “सीडब्लूसी” के 52 बूढ़े बरगद और स्वयं काँग्रेस नेतृत्व के अनियमित स्वभाव के कारण है जो एक चापलूस पसंद अध्यक्ष है। उदाहरण देखिए , हरियाणा में हुए विधानसभा का एक उपचुनाव तक ना जीत पाने वाले और तीसरे नंबर पर रहने वाले “रणदीप सिंह सुरजेवाला” इस राष्ट्रीय पार्टी के नीतिनिर्धारकों में से हैं और जनाधार रखने वाले लोग पार्टी में या तो हाशिए पर हैं या पार्टी छोड़ कर चले गये।

दरअसल सिर्फ सुरजेवाला ही क्युँ ? पार्टी का पूरा का पूरा शिर्ष नेतृत्व ही जनाधार विहीन नेताओं और व्यक्तिगत गैर राजनैतिक दोस्तों से घिरा हुआ है , आपको याद है कि ए के ऐन्टोनी का क्या जनाधार है ? अहमद पटेल की जेब में क्या जनाधार है ? जनार्दन द्विवेदी ने कब चुनाव लड़ा और 1000 वोट भी पाए ? मोतीलाल बोरा के पास क्या है जो अब भी पार्टी में नेतृत्व के खासमखास हैं ? पीएल पुनिया के पास क्या जनाधार है ? जो वह अहम पदों पर बने हुए हैं ? मोहन प्रकाश, ऑस्कर फर्नांडीज ने कब चुनाव जीत कर अपने जनाधार को सिद्ध किया है ? और ऐसे जनाधारविहीन लोग पार्टी चलाएँगे तो पार्टी किसी मुद्दे पर जनआंदोलन का सोच भी कैसे सकती है ? हार का एक मात्र यही कारण है।

मोदी सरकार की तमाम विफलताओं , ईवीएम , जीएसटी , नोटबंदी और राफेल में हुए घोटाले को लेकर राहुल गाँधी द्वारा जनआंदोलन ना चलाना और एयरकंडीशन रूम में बैठकर प्रेस के सामने राफेर राफेल करना तथा हेलिकाप्टर राजनीति करना ही हार का वह कारण है जिसे काँग्रेस पिछले 23 दिन से ढूँढ तो रही है परन्तु मिल नहीं रहा है।

यदि काँग्रेस का ऐसा ही नेतृत्व करना है , ऐसा ही चिंतन करना है तो राहुल गाँधी को निश्चित रूप से काँग्रेस का पद त्याग कर सपरिवार राजनीति से सन्यास ले लेना चाहिए और काँग्रेस का अध्यक्ष भूपेश बघेल तथा सचिन पायलट जैसे मेहनतकश जनाधार वाले हार्डकोर काँग्रेसी को बना देना चाहिए।

हाँलाकि राहुल गाँधी के पास सामर्थ है , साहस है , ज़िद है , विज़न है परन्तु टेलीवीज़न नहीं है और ना उसे पाने की उन्होंने कोशिश की। किसी के पास टेलीवीज़न आता है उसके समर्थन में भीड़ देखकर , टेलीवीज़न आता है खुद की लोकप्रियता सिद्ध करने पर जो कि राहुल गाँधी कभी ना कर सके।

याद नहीं आता कि राहुल गाँधी ने कभी पूरे देश को आह्वाहन करके दिल्ली में कोई रैली की हो और “दिल्ली चलो” जैसा कोई कार्यक्रम करके 10-15 लाख लोगों को दिल्ली में जमाकर के दिल्ली जाम कर दिया हो , या किसी मुद्दे पर 8-10 दिन भूख हड़ताल और अनशन किया हो तो फिर आप सिर्फ मीडिया को कोसकर अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकते।  सोचिए कि काँग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी किसी माँग को लेकर लाखों लोगों के साथ दिल्ली में अनशन या भूखहड़ताल पर 10 दिन बैठ जाते तो देश का पूरा का पूरा वातावरण कैसे बदल जाता ? और फिर मीडिया क्युँ उनको अधिक फुटेज नहीं देता ?

प्रियंका गाँधी की पहली लखनऊ यात्रा को देश के सभी चैनलों ने 12 घंटा लगातार लाईव प्रसारित किया था कि नहीं ? अगर काँग्रेस लगातार ईवीएम , जीऐसटी , नोटबंदी और राफेल घोटाले के विरुद्ध 2 साल देश भर में आंदोलन करके दिल्ली में राष्ट्रीय स्तर की 3-4 रैली कर के 10-15 लाख लोगों को इकट्ठा कर लेती तो आज राहुल गाँधी प्रधानंमत्री होते। दरअसल बदल गये राजनैतिक कल्चर में काँग्रेस और उसकी सीडब्लू सी खुद को ढाल ना सकी और काँग्रेस अध्यक्ष असहाय बना सिर्फ हेलिकाप्टर राजनीति करते रहे।

तो सबसे पहले इस “सीडब्लूसी” जैसे गुटबाजी पैदा करने वाली व्यवस्था को ही खत्म कर देना चाहिए , और फिर खत्म करना चाहिए जकड़न और जनआंदोलन के मोड में आ जाना चाहिए। पता नहीं काँग्रेस के नेताओं को क्युँ नहीं दिखता कि मात्र एक जनआंदोलन से ही दिल्ली में दो नायक पैदा हुए और दो-दो सरकारें प्रचंड बहुमत से चुनी गयीं।

परन्तु काँग्रेस के बूढ़े जर्जर जनाधारविहीन वाले “सीडब्लूसी” के नेता , बैठे बैठे अपने नायक के जन्म लेने की उम्मीद में बैठे हैं और जनता से उम्मीद लगाए बैठे हैं कि जनता उनके पास खुद चलकर आएगी और सत्ता उनकी झोली में डालकर गिड़गिड़ाएगी कि आईए सरकार , आप ही हमारे एकमात्र माई बाप हैं।

बैठे रहो और खत्म होते रहो।

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