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जंगलराज पार्ट-2 की याद : लालू का S-3 गैंग, कैबिनेट में खैनी की डिमांड और सीएम हाउस से फिरौती के फोन

लालू यादव ने सीएम का बंगला लेने से मना कर दिया। अधिकारियों और मंत्रियों की हाजिरी पटना के वेटनरी कॉलेज में लगने लगी जहां दो कमरे के फ्लैट में वो रहते थे। सत्ता में आने के महीने भर के भीतर वो औचक निरीक्षण पर निकलने लगे। चाहे कोई छोटा दफ्तर हो या जिला मुख्यालय, वे बिना बताए कभी भी आ धमकते। अधिकारियों की क्लास लगाते। शट अप.. मैं हूं चीफ मिनिस्टर… पूरे सूबे में हड़कंप मच गया। जनता में उम्मीद की आस जगी। ऐसा सीएम है जो किसी कोताही को बर्दाश्त नहीं करेगा।

दरअसल ये सत्ता के सामाजिक बदलाव का काल था। लालू ने खुलेआम ब्राह्मण व्यवस्था के खिलाफ मूर्तिभंजक स्वरूप धारण कर लिया। इसी बल पर 1991 में केंद्र से जनता दल की विदाई के बाद भी लालू ने बिहार में पार्टी की पकड़ ढीली नहीं होने दी। लेकिन लालू संतुष्ट कभी नहीं रहे। वो वोट बैंक का ऐसा मिश्रण चाहते थे जो उन्हें अपराजेय बना दे। 22 अक्टूबर, 1990 को वो मौका भी मिल गया। लालू ने समस्तीपुर में लालकृष्ण आडवाणी का राम रथ रोक लिया। आडवाणी अरेस्ट कर लिए गए। जो कहीं नहीं हो सका उसे लालू ने कर दिखाया। भागलुपर दंगे की आंच में जल रही कांग्रेस मुसलमान मतों से सदा के लिए दूर हो गई। देवीलाल के दिए दो मंजिले एकता रथ पर सवार होकर लालू ने अपनी ताकत का एहसास कराया। सीतामढ़ी में छिटपुट दंगे हुए तो लालू खुद वहां पहुंच गए और डीएम की तरह कमान संभाल ली। बिहार में नए राष्ट्रीय नेता का अभ्युदय हो रहा था।

​कैबिनेट में खैनी की डिमांड और सवर्णों की नाक मरोड़ना
जून के महीने में लालू यादव एक अणे मार्ग शिफ्ट हो गए। हवाला प्रोटोकॉल और सेक्युरिटी का दिया। सच्चाई कुछ और थी। सत्ता सुख में तल्लीन लालू अपना राज चलाने आए थे। सरकार नहीं। इसकी भनक शुरुआती एक साल में नहीं लगी। उनके उटपटांग फैसलों की विदेशी पत्र पत्रिकाओं में चर्चा हुई। 150 चरवाहा स्कूल खोले गए, ताड़ी से टैक्स हटाया गया। लालू की खूब सराहना हुई। वो थोड़ा अलग सोंचने वाले सीएम के तौर पर उभऱ रहे थे। पर, उनके पास कोई थिंकटैंक था ही नहीं। जब आला अफसरों से लालू खैनी की डिमांड करते तो गरीब-गुरबों में गहरा संतोष का भाव दिखाई देता – देखो हमारा सीएम बिल्कुल अपने जैसा है, कैसे इन अफसरों की औकात बता रहा है।बोर्ड, निगमों और को-ऑपरेटिव की भर्तियों में लालू यादव ने खास जातियों को तरजीह दी। ऐसा करते हुए वे सवर्णों की नाक मरोड़ना नहीं भूले।

उन्होंने मैथिली की एक आधिकारिक भाषा के रूप में मान्यता रद्द कर दी, क्योंकि वह संस्कृत के प्रभाववाली ब्राह्मणों की जुबान के रूप में देखी जाती थी। उन्होंने पटना गोल्फ क्लब को इस आधार पर बंद कर देने के आदेश दिए कि वह अमीरों के बेकार मनोरंजन का स्थान था। वे पटना में गोशालाओं की बाढ़ और सड़कों पर मवेशियों की मौजूदगी को लेकर हुए व्यापक विरोध पर हँसते हुए बोले कि उससे हवा और स्वच्छ हो जाएगी। उन्होंने एक मीडिया कार्यशाला आयोजित की—पटना मेडिकल कॉलेज हॉस्पिटल के डॉक्टरों को अपने बगल में बिठाकर गाय के गोबर के गुणों की व्याख्या करने के लिए। ‘‘ये एंटीसेप्टिक है।’’

उन्होंने अपनी उँगलियों के बीच थोड़ा सा गोबर मसलते हुए घोषणा की, ‘‘बचपन में गाँव में जब हम लोगों को चोट लग जाती थी, हम गाय का गोबर लगा लेते थे और चोट ठीक हो जाती थी। गाय के गोबर का इस्तेमाल करिए। ये स्वास्थ्य के लिए अच्छा होता है।’’ मीडिया को मजा आ रहा था, डॉक्टर कसमसा रहे थे, शहरी मध्यम वर्ग घृणा से देख रहा था लेकिन लालू यादव ने अपनी बात कह दी। वे गोशालाएँ नहीं हटवाने वाले थे। लालू समझ गए थे कि दलितों, शोषितों , वंचितों का बड़ा तबका उन पर गर्व कर रहा है। सीएम की कुर्सी पर उनकी तरह रहने, दिखने और सोचने वाला व्यक्ति बैठा है। इस संतुष्टि को किसी विकास की जरूरत नहीं थी।

लालू ने फ्लाइंग क्लब के हेलिकॉप्टरों पर कब्जा जमा लिया। कभी-कभी तो वो दिल्ली भी हेलिकॉप्टर से जाते और थका देने वाली यात्रा कर लौट आते। लालू ने इसे उड़न खटोले का नाम दिया। कई बार जब वो किसी गांव में जाते तो कहते.. आओ आओ.. पास आओ.. तुम्हारा चीफ मिनिस्टर आया है.. देखो तुम जैसा आदमी भी उड़न खटोले में बैठ सकता है। कभी-कभी वो लुंगी-बनियान पहने किसी अनजान को इसकी सैर भी कराया करते। इन तरकीबों से लालू उस तबके के दिल में जगही पक्की कर रहे थे।

​S-3 गैंग का दबदबा और तीसरे की एंट्री
एस-3 का मतलब साधु यादव, सुभाष यादव और शहाबुद्दीन। दोनों यादव लालू के साले हैं। भोला यादव अब दिखाई देते हैं। पहले दोनो साले ही लालू के कंधे पर बैठकर साहब के ऑर्डर की तामील कराते थे। अभी तिहाड़ जेल में कैद शहाबुद्दीन मुस्लिम कार्ड था। उसे सीवान और आस-पास के इलाकों में खुली छूट मिली हुई थी। वो ऐसा डॉन था जिस पर लालू पुलिस से ज्यादा भरोसा करते थे। शाहाबाद समेत मध्य बिहार के सभी इलाकों में जमीन के लिए सशस्त्र संघर्ष और जातीय नरसंहार लालू को मिश्राजी से विरासत में मिली। इस पर लगान लगाने के लिए भी डॉन शहाबुद्दीन का इस्तेमाल हुआ। लालू इस पर इतना भरोसा करते थे कि जब देवगौड़ा की सरकार बनी तो शहाबुद्दीन देश का गृह राज्य मंत्री बन गया। इस पर हत्या और लूट के कई मामले हैं। माले के कार्यकर्ता की हत्या के मामले में अभी आजीवन कारावास भुगत रहा है।दोनों सालों में साधु यादव 2010 में ही लालू से दूर हो गए।

एक कहानी ये भी है कि शहाबुद्दीन से साधु की अनबन हुई। लालू ने शहाबुद्दीन का साथ दिया। साधु यादव फिर 2020 के चुनाव में भाग्य आजमा रहे हैं। पर शुरुआती वर्षों में सीएम हाउस में रहने वाले सुभाष और साधु यादव ने खूब गदर काटा। 2002 में लालू की दूसरी बेटी रोहिणी की शादी थी। गेस्ट को एयरपोर्ट से होटल लाने ले जाने के लिए गाड़ियों की जरूरत पड़ी। साधु यादव ने अपने गुर्गों को भेजा। बोरिंग रोड में मारुति, ह्यूंदई के शो रूम की गाड़ियां जबरन उठा ली गई। बाद में तो कई ब्रांड पटना से बोरिया बिस्तर समेट कर रांची चले गए। एस-3 के अलावा पप्पू यादव और दुलारचंद यादव जैसे आपराधिक छवि के लोगों ने लालू के दिल में जगह बनाई। एक बार दुलारचंद ने 10 लोगों का फिरौती के लिए अपहरण किया। डील सीएम हाउस से सेट हुई। इसका खुलासा खुद दुलारचंद ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में किया था। धीरे-धीरे सारे यादव अपराधी नेता बनने लगे।

सीएम हाउस से फिरौती के फोन
किसी का अपहरण होता, रिश्तेदारों को फोन किया जाता, पैसे दिए जाते और पीडि़त रिहा कर दिया जाता। पुलिस या राज्य की कोई भूमिका नहीं होती। अधिकांश मामलों में इसलिए, क्योंकि वे खुद भी शामिल होते। कई मामलों में, जहाँ पीडि़त परिवारों का शक्तिशाली लोगों से संपर्क होता, वे राजनीतिक प्रभाव का उपयोग करके अपने रिश्तेदारों की रिहाई सुनिश्चित करवा लेते। पटना के एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी के हवाले से एक किताब में बताया गया है ‘‘इनमें से अधिकांश गिरोह पटना के मंत्रिस्तरीय बँगलों में बैठे लोगों को जवाब देते हैं। फिरौती की रकम साझा की जाती है। यदि आपके सही लोगों से संपर्क हैं तो आप आसानी से साँस ले सकते हैं, क्योंकि अधिकांश अपहरणों के पीछे राज्य या राज्य चलानेवाले होते हैं।’’ लालू यादव के कार्यभार सँभालने के बाद के आठ वर्षों में 17,000 लोगों का अपहरण हुआ, जिनमें से अधिकांश का फिरौती के लिए हुआ था। अपहरण करना बहुत आसान था और बहुत लाभप्रद भी। इसी अवधि के दौरान बिहार में 51,528 लोगों की हत्याएँ हुईं। इन आँकड़ों में राजनीतिक/जातीय हिंसा के शिकार लोग शामिल नहीं हैं। 24,000 डकैतियाँ हुईं, लूट की 24,699 घटनाओं की सूचना मिली और 7,290 महिलाओं के साथ बलात्कार किया गया।

राज्य की जेलें अपराधियों से भरी हुई थीं। लेकिन ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे जेलों के बाहर और अधिक अपराधी मौजूद हैं। राज्य की 8 केंद्रीय जेलों में 11,521 कैदियों/विचाराधीन कैदियों को रखने की क्षमता थी; लेकिन वर्ष 1998-99 में उनमें 23,802 कैदी थे। 30 जिला जेलों में 9,303 कैदियों को रखने की क्षमता थी, लेकिन उनमें 37,654 कैदी/विचाराधीन कैदी भरे हुए थे।1995 तक शाम के बाद सड़कें सुनसान होने लगीं। अगर रेलवे स्टेशनों पर ट्रेन लेट से पहुंचती तो यात्री सूर्यास्त के बाद वहीं रात गुजारते। लूट के लिए हत्या एक आम बात थी। पुलिस थानों की जर्जर हालत और गिरते मनोबल से अपराधियों में डर बिल्कुल खत्म हो चुका था। आरजेडी के स्थानीय नेताओं के थप्पड़ कब बीडीओ या थानदेार को रसीद हो जाएं, कहना मुश्किल था।

​भ्रष्टाचार की गंगा में बहने लगा बिहार
भ्रष्टाचार की शुरुआत तो 1990 में सीएम पद की रेस में रहते हो गई थी। लालू ने विधायक दल का नेता चुने जाने के लिए चुनाव की मांग रख दी थी। राम सुंदर दास उनके खिलाफ थे। वेटनरी कॉलेज में पशुपालन विभाग के आरके राणा से पुरानी दोस्ती काम आई। दावा किया जाता है कि पैसों के लेन-देन में राणा ने उनकी काफी मदद की। राणा की नियुक्ति लालू के कहने पर जगन्नाथ मिश्र ने की थी। जब लालू सीएम बने तो उलटी पैरवी आई। मिश्राजी के कहने पर श्यामबिहारी सिन्हा रांची जोन में पशुपालन विभाग के डायरेक्टर बने। आगे चलकर सीएम समेत ये तीनों उस पशुपालन घोटाले में दोषी ठहराए गए जिसमें लालू अभी भी जेल की हवा खा रहे हैं।

950 करोड़ रुपए के चारा घोटाले ने सियासी भूचाल भले ला दिया हो लेकिन पॉकेट भर गए। फिर इंजीनियरिंग कॉलेजों में एडमिशन घोटाला, अलकतरा घोटाला… और न जाने क्या-क्या। चारा घोटाले की पोल 1995 के चुनाव के बाद खुली थी। 1995 का चुनाव लालू सामाजिक गठजोड़ के बूते जीत चुके थे। एक साल पहले वैशाली से लवली आनंद की जीत ने उन्हें संजीवनी दे दी थी। वो घूम-घूम कर दलितों की बस्ती में जाते, अंबेडकर का नारा बुलंद करते और कहते – देखो, वो लोग तुम्हारा राज छीनने आ रहा है। सतर्क हो जाओ। बहुत मेहनत से तुमको गद्दी मिला (मिली) है। इसी ने लालू का काम आसान कर दिया। प्रशासनिक मशीनरी में लगे जंग और जीडीपी से उस वोट बैंक को कोई मतलब नहीं था।

केंद्र सरकार से बिहार के मुख्य सचिव को आई वो चिट्ठी
केंद्रीय कृषि मंत्रालय के सचिव एनसी सक्सेना बिहार के हालात से इतने खिन्न हुए कि उन्होंने राज्य के मुख्य सचिव को एक पत्र लिखा। इसमें लिखा था.. बिहार में राजनीतिक पतन के कारणों में जाए बिना यह एक खुला तथ्य है कि विकास मशीनरी लगभग ढह चुकी है। सत्ता और अधिकार का व्यक्तिगत लाभ के लिए उपयोग करने की धारणा बन गई है। प्रखंड विकास अधिकारियों से लेकर कई जिला कलेक्टर और अक्सर कई सचिव भी पैसे बनाने में या अपने राजनीतिक आकाओं के लिए पैसे इकट्ठा करने में व्यस्त हैं…चूँकि भ्रष्टाचार नौकरशाही के उच्च स्तर पर भी बढ़ता जा रहा है, निचले स्तर के अधिकारियों के मन से डर गायब हो गया है। निचले स्तर की नौकरशाही में कोई नैतिकता नहीं है। सार्वजनिक उद्देश्य के प्रति कोई भावना नहीं है। देश के भविष्य में उनकी कोई भागीदारी नहीं है,। वर्ष 1997-98 के दौरान केंद्रीय मंत्रालय द्वारा 1,177 करोड़ रुपए बिहार को ग्रामीण विकास की विभिन्न योजनाओं को लागू करने के लिए उपलब्ध कराए गए थे।

चूँकि बिहार में गरीब परिवारों की अनुमानित संख्या करीब 50 लाख है, प्रति परिवार आवंटन 2,350 रुपए प्रति वर्ष प्रति परिवार आता है, जो एक पर्याप्त रकम है। गरीबों के लिए शायद बेहतर होता, यदि नौकरशाही को दरकिनार करके हम यह राशि उन्हें सीधे मनीऑर्डर द्वारा भेज सकते। पेयजल योजनाओं के लिए हमारे विभाग द्वारा एक रुपए की भी मंजूरी नहीं दी गई है; क्योंकि बिहार सरकार पिछले एक वर्ष में पाइपें खरीदने की प्रक्रियाओं को अंतिम रूप नहीं दे पाई है। बिहार के फील्ड अफसरों के बीच सामान्य भावना यह है कि सचिवालय काफी हद तक बेकार हो चुका है।’

जब एक साल में मात्र 6 किलोमीटर सड़क बनी

1990 में जब लालू यादव ने जगन्नाथ मिश्र से सत्ता ग्रहण की, तब बिहार पर लोन 12,375.16 करोड़ रुपए था और कुल संपत्ति 11,828.69 करोड़ रुपए थी। जब सन् 1995 में लालू यादव फिर सत्ता में आए तो लोन 18,769.75 करोड़ रुपए तक पहुँच गया था और संपत्ति 15,006.8 करोड़ रुपए थी। ये फासला 2000 तक और बढ़ गया। तब लोन 30,932.45 करोड़ रुपए पर आ गया था। संपत्ति 20,389.45 करोड़ रुपए थी। विकास पर खर्च की दर लगातार घट रही थी, क्योंकि राज्य सरकार केंद्रीय कोष की बराबरी करने लायक रकम नहीं जुटा पा रही थी। साल-दर-साल बिना इस्तेमाल के रकम वापस भेजी जा रही थी। अकसर राज्य सरकार नियमों का उल्लंघन करके विकास की मद में भेजे गए केंद्रीय धन का उपयोग कर्मचारियों के वेतन का भुगतान करने के लिए करती थी। वर्ष 1997-98 में सरकार गैर-योजना निधि के 272.8 लाख रुपयों में से सिर्फ 175 लाख रुपए और योजना निधि के 790 लाख रुपयों में से सिर्फ 513 लाख रुपए खर्च कर पाई।

अगले वित्त वर्ष में निधि के उपयोग में और गिरावट आ गई। गैर-योजना निधि के उपलब्ध 525.62 लाख रुपयों में से 254.16 लाख और योजना निधि के 100 लाख रुपयों में से 77 लाख रुपए खर्च हुए। वास्तव में, वर्ष 1997-98 तक लोक निर्माण में एक ठहराव आ गया था। उस वर्ष बिहार में सिर्फ 6 किलोमीटर नई सड़कें बिछाई गई थीं और लक्षित 330 में से सिर्फ 5 गाँवों में बिजली पहुंची। राज्य के अधिकारियों और कर्मचारियों को वेतन नहीं मिलता था; लेकिन उनके राजनीतिक आकाओं को कभी धन की कमी का सामना नहीं करना पड़ता था। उनकी लूट की कभी कोई सीमा नहीं थी।

तो क्या जंगलराज पार्ट-2 की यादें धुंधली हो गई हैं? जवाब है – नहीं। हां ये जरूर है कि तब से अब तक गंगा में काफी पानी बह चुका है। लालू के लाल तेजस्वी रोजगार और डेवलपमेंट की बातें कह रहे हैं। लेकिन नौवीं फेल होने का तोहमत लिए तेजस्वी 10 लाख नौकरियां देने के वादे के साथ नौजवानों में कितना भरोसा जगा पाते हैं, ये 10 नवंबर को पता चलेगा।

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