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‘चाणक्य’ ने बिछाई ऐसी बिसात, जो कल तक आंख दिखाते थे, वो अब जोड़ रहे हाथ

27 जुलाई को कश्मीर से जुड़ी एक बड़ी खबर आई थी कि केंद्र सरकार ने घाटी में बीएसएफ और सीआरपीएफ जवानों की 100 अतिरिक्त कंपनियों को कश्मीर में तैनाती के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है. अब एक हफ्ते से भी कम समय में सरकार 28 हज़ार और सैनिकों को घाटी में तैनात कर रही है. अब यह अटकलें लगाई जा रही है कि सरकार द्वारा 15 अगस्त यानि स्वतन्त्रता दिवस के मौके पर अनुच्छेद 370 या 35 ए को लेकर कोई बड़ा फैसला लिया जा सकता है. ये सबकुछ गृहमंत्री अमित शाह की टेबल से फाइनल हो रहा है, इसीलिए कश्मीर के क्षेत्रीय दलों में हड़कंप मचा हुआ है.

आज पीडीपी वाली महबूबा मुफ्ती पीएम मोदी के आगे हाथ जोड़ रही हैं, जबकि एनसी वाले अब्दुल्लाह दो दिन पहले ही मोदी से मुलाकात करके आए थे. इस मुलाकात के बाद उमर अब्दुल्ला ने कहा, ‘हमने पीएम मोदी से कहा है कि रियासत में कोई ऐसे कदम न उठाए जाएं, जिससे वहां की स्थिति खराब हो. हमने 35ए और 370 का भी मामला उठाया. साथ ही जम्मू-कश्मीर में चुनाव कराने की मांग की’.

कुल मिलाकर अब इन नेताओं को पूरी तरह आभास हो चुका है कि पीएम मोदी के मजबूत नेतृत्व में सरकार कोई भी बड़ा कदम उठा सकती है, और मुफ़्ती और अब्दुल्ला परिवार के कथित विरोध का अब सरकार पर कोई फर्क नहीं पड़ने वाला. यही कारण है कि जो फारूख अब्दुल्ला अनुच्छेद 35ए और 370 हटाने के खिलाफ केंद्र सरकार को धमकी दिया करते थे, आज वे खुद अनुच्छेद 35ए में बदलाव को अपनी स्वीकृति दे रहे हैं.

दरअसल मोदी सरकार के पास अब संसद में पहले से ज़्यादा बहुमत है, और इसके साथ ही अमित शाह के रूप में गृह मंत्रालय का नेतृत्व पहले से ज़्यादा मजबूत हुआ है. यही कारण है कि अब इन ठेकेदार नेताओं के सामने उनकी बढ़ती महत्वहीनता के रूप में बड़ी मुश्किलें खड़ी हो रही हैं और इन्हें अब अपने ऊपर अस्तित्व का खतरा मंडराता नजर आ रहा है. इसीलिए अब बयानबाजी करके जरिये ये लोग दोबारा अपने आप को लाइमलाइट में लाना चाहते हैं.

ये नेता अब दोबारा इस मुद्दे को उठाकर सिर्फ सुर्खियां बटोरना चाहते हैं और अगर इन्हें इन विषय पर सरकार से कोई बातचीत ही करनी थी, तो वे सत्ता में रहने के दौरान भी कर सकते थे. आज जब ये नेता पूरी तरह शक्तिहीन और सत्ताहीन हो चुके हैं, तो अब ये अपने आप को कश्मीरियों का हितैषी होने का दिखावा कर रहे हैं. हालांकि, केंद्र सरकार ऐसे नेताओं के दबाव में आने के मूड में बिलकुल नहीं है. सरकार द्वारा कश्मीर में अतिरिक्त 28000 जवानों की तैनाती होना यही दर्शाता है कि सरकार कोई बड़ा कदम उठाकर ही रहेगी, और इसके साथ ही ये भी स्पष्ट भी कर दिया है कि सरकार इन नेताओं का हित नहीं, बल्कि कश्मीरियों के हित को ज्यादा महत्व देगी.

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