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‘कांग्रेस का “समाधि स्थल” ढूंढ लीजिए, 2024 तक इसकी मृत्यु की सूचना मिल जाएगी’

लोकसभा चुनाव के बाद काँग्रेस में जो घटनाएँ घटी हैं उससे विपक्ष के खेमे का हर कोई इंसान निराश है और वह अब मान रहा है कि इस देश की राजनीति में “काँग्रेस” अब खत्म होने की कगार पर है।

और इन दो महीनों में सबसे अधिक निराश राहुल गाँधी ने किया है। यह ठीक है कि वह अपने नेतृत्व में लोकसभा का चुनाव बुरी तरह हारे पर यह भी सच है कि वह इन चुनावों में विपक्ष का एक मज़बूत और दमदार चेहरा बन कर उभरे और विपक्षी राजनीति की धूरी बने।

काँग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा देकर उन्होंने यह सब खो दिया है। उनका दिया इस्तीफा भले ही चुनाव में हार के बाद उनके द्वारा इसकी ज़िम्मेदारी लेने के रूप में कहा गया परन्तु हकीकत यह है कि काँग्रेस अध्यक्ष जैसा बड़ा पद उनको 6 महीने में ही बोझ लगने लगा और उनकी पार्ट टाइम राजनीति के खाँचे में फिट नहीं हो पा रहा था।

राहुल गाँधी हों या प्रियंका गाँधी हों यह सब पार्ट टाइम पालीटिक्स करते हैं जबकि आज का दौर फुलटाइम का छोड़िए बल्कि “ओवरटाइम” का है। यह इन लोगों को भाजपाध्यक्ष अमित शाह से सीखना चाहिए।

दरअसल गाँधी परिवार सड़क और ज़मीन पर लगातार संघर्ष करने की क्षमता खो चुका है , यद्धपि वह मौके मौके पर “पार्ट टाइम पालिटिक्स” करके “सोनभद्र” या “भट्टा परसौल” जैसा एक दो शो करता है फिर महीनों के लिए अपने दिल्ली स्थित दरबे में घुस जाता है।

अब यह सब करके सत्ता पाने का समय चला गया , यदि काँग्रेस यह समझती है कि मौजूदा सत्ता से नाराज़ होकर जनता उसे बिना कुछ किए 2004 की तरह सत्ता थमा देगी तो वह अभी भी भ्रम में है क्युँकि 75 हिन्दी न्यूज़ चैनल जनता के सरकार विरोधी विचार को धुलने के लिए 24×7 लगे हुए हैं और सरकार के घिरते ही यह चैनल सरकार के प्रवक्ता की तरह जनता का मोदी सरकार के पक्ष में ब्रेनवाश करने लगते हैं।

मेरी समझ से राहुल गाँधी का इस्तीफा उनकी मुर्खता को दिखाता है , क्युँकि अब वह समय चला गया कि हारने पर पार्टी का अध्यक्ष इस्तीफा दे। एकाउंटबिलटी की जगह उनको मक्कारी , धुर्तता और साजिश वाली राजनीति का काट ढूँढना चाहिए था उनको डटे रहना चाहिए था , लोकसभा में पार्टी का नेता बनना चाहिए था और संसद में डटकर सरकार का मुकाबला करना चाहिए था। नेता ऐसे ही बना जाता है। पर राहुल गाँधी ने संभवतः अपनी क्षमताओं का आकलन करके यह तय किया कि वह यह सब नहीं कर सकते और इस्तीफा दे दिया।

और काँग्रेस तो काँग्रेस , एक गैरगाँधी नेता आगे आएगा तो चार उसकी टाँग पकड़ कर उसे पीछे खीचेंगे। और यही दो महीने चला। और अंत में टाँग खिचव्वल में फिर “गाँधी” ही एक मात्र विकल्प बचा।

अफसोस राहुल गाँधी के इस्तीफे के निर्णय से अधिक काँग्रेस के बूढ़े बरगदों के “सोनिया गाँधी” को अंतरिम अध्यक्ष बनाने के निर्णय से है जिससे राहुल गाँधी की खींची “गैरगाँधी अध्यक्ष” की वह लाइन झूठी हो गयी जिसको वह पिछले 2 महीने से वह खींच रहे थे।

दरअसल लोकसभा चुनाव की हार से अधिक काँग्रेस की अंदरूनी राजनीति से राहुल गाँधी हताश दिखे और वह उन बूढ़े बरगदों के सामने नतमस्तक हो गये जिनको वह अप्रत्यक्ष रूप से संघ का आदमी कहते रहे हैं। अब वह संघी बूढ़े बरगद बीमारग्रस्त सोनिया गाँधी के अंतरिम अध्यक्ष बनने के बाद फिर मज़बूत होंगे। वही अहमद पटेल वही जनार्दन द्विवेदी वही मोतीलाल बोरा जैसे जनाधार विहीन मठाधीश अब काँग्रेस चलाएँगे।

हास्यास्पद और चिंताजनक है कि काँग्रेस को गाँधी परिवार से अलग कोई अंतरिम अध्यक्ष नहीं मिला , सीडब्लूसी चुँकी अंतरिम अध्यक्ष ही चुन सकती है तो उसने यही किया , आगे औपचारिकता पूरी करके लगभग सन्यास ले चुकीं सोनिया गाँधी को फिर अध्यक्ष बना दिया जाएगा।

यह विचित्र स्थीति है , राहुल गाँधी अपनी विश्वसनायता और पिछले 3-4 साल की मेहनत को खो चुके हैं और वह अब क्या करेंगे यह भविष्य के गर्भ में है।

कुल मिलाकर सार यह है कि बीमार सोनिया गाँधी को पुनः अध्यक्ष बनाए जाने की जगह प्रियंका गाँधी को इस पद पर चुना जाता तो कहीं बेहतर था। क्युँकि जनता से कनेक्टिवटी में प्रियंका गाँधी के मुकाबले सोनिया गाँधी ज़ीरो ही साबित हुई हैं।

हालाँकि सोनिया गाँधी के अध्यक्ष बनने के कुछ सकरात्मक पहलू भी हैं , वह यह है कि अध्यक्ष पद पर रह कर वह विपक्ष की एकता को बना सकती हैं और उनकी स्विकार्यता अन्य विपक्षी दलों में भी है। जबकि राहुल गाँधी ऐसी स्विकार्यता ना होने के कारण ही 2019 के लोकसभा चुनाव में विपक्ष को एक ना कर सके।

ममता से लेकर मायावती और शरद पवार जैसे कहीं वरिष्ठ नेता राहुल गाँधी का नेतृत्व स्विकार करने की बजाय राहुल गाँधी से दूरी बना कर ही चले , सोनिया गाँधी के अध्यक्ष बनने के बाद विपक्षी एकता का कम से कम यह अवरोध तो दूर होगा ही।

फिर भी यदि काँग्रेस किसी गैरगाँधी को अध्यक्ष बनाती तो बेहतर था पर “अंधा बांटे रेवड़ी, फिर-फिर अपनों को दे” यही हाल है काँग्रेस का।

काँग्रेस का यही हाल रहा तो उसका “समाधि स्थल” ढूँढ लीजिए , 2024 तक इसकी मृत्यु की सूचना देश को मिल जाएगी।

ये लेख स्वतंत्र टीकाकार मोहम्मद जाहिद के फेसबुक पेज से साभार लिया गया है. ये लेखक के निजी विचार हैं.

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