बिहारराजनीति

अब जो ‘गेम’ करने जा रहे हैं नीतीश कुमार, उसके लिए ‘साथी’ हैं कितने तैयार?

एक गठबंधन से दूसरे गठबंधन में कूदना, अपने साथियों की पीठ पर छुरा घोंपकर राजनीतिक विरोधियों के साथ हाथ मिलाना तो नीतीश कुमार की राजनीति का अटूट हिस्सा रहे हैं। अब लगता है कि ठीक बिहार विधानसभा चुनावों से पहले नीतीश कुमार यही दोहराने का प्रयास कर रहे हैं। बीते मंगलवार यानि 25 फरवरी को नीतीश कुमार और तेजस्वी यादव की बंद कमरे में 20 मिनट लंबी चली मुलाक़ात के बाद अब सियासी गलियारों में हलचल तेज हो गई है। ऐसा तब हो रहा है जब हाल ही में बिहार विधानसभा में JDU और RJD के विधायकों ने साथ मिलकर NRC के खिलाफ प्रस्ताव पारित किया था। यानि जहां एक तरफ विधानसभा में JDU ने NDA को डंप कर दिया तो वहीं अब वे सियासी मैदान में भी BJP विरोधी राह अपनाते दिखाई दे रहे हैं, लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या इस बार भी वे सफल हो पाएंगे?

ऐसा भी हो सकता है कि नीतीश कुमार चुनावों में BJP से ज़्यादा सीटें हासिल करने के लिए BJP पर दबाव बना रहे हों और लगातार अन्य राज्यों में सरकार खोती जा रही BJP की कमजोरी का फायदा उठाकर अपने हितों को सर्वोपर्रि रखते हुए सीट बंटवारे पर समझौता करने की योजना बना रहे हों। यह बात सच है कि BJP ने झारखंड और महाराष्ट्र में अपनी सरकार खोई है और दिल्ली में उसे अगले 5 सालों के लिए सत्ता से और दूर कर दिया गया है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि BJP अब बिहार जैसे राज्य में बैकफुट पर आ जाएगी। बिहार में हुए लोकसभा चुनावों में NDA को 40 में से 39 सीटें मिली थीं, जो यह दर्शाता है कि पीएम मोदी की लोकप्रियता राज्य में बरकरार है। महाराष्ट्र में भी चुनावी मैदान में उतरे NDA को पूर्ण बहुमत मिला था, जिसे बाद में शिवसेना ने NCP और कांग्रेस के साथ हाथ मिलाकर खंडित कर दिया। दिल्ली में भी हमें भाजपा के वोट शेयर में पिछले चुनावों के मुक़ाबले बढ़ोतरी देखने को मिली, जिससे यह कहना गलत होगा कि BJP को लोगों ने नकार दिया। ऐसे में बिहार चुनावों में BJP को कम आंकना नीतीश कुमार की सबसे बड़ी गलती साबित हो सकती है।

अब आते हैं JDU और RJD के संभावित गठबंधन पर। JDU और RJD इससे पहले वर्ष 2015 में साथ मिलकर चुनाव लड़े थे, तो दोनों पार्टियों ने मिलकर BJP को नाकों चने चबवा दिये थे। नीतीश कुमार सोच रहे हैं कि अब की बार भी वे ऐसा दोहरा सकते हैं। लेकिन, क्या आज की नेतृत्वहीन RJD में वो दम है जो कभी लालू की RJD में हुआ करता था। लालू चारा घोटाले के कारण जेल में बंद हैं और तभी से RJD leadership crisis से जूझ रही है। लालू के दोनों बेटे, तेजप्रताप यादव और तेजस्वी यादव, अभी तक कुछ भी बड़ा कर दिखाने में असफल साबित हुए हैं। ऐसे में नीतीश कुमार अगर ऐसे समय में बिखरी पड़ी RJD के साथ गठबंधन करते हैं, तो इससे दोनों पार्टियों का खस्ताहाल होना तय होगा।

नीतीश कुमार का इतिहास रहा है कि वे चुनावों की परिस्थिति और अपना हित देखकर यू टर्न लेते हैं। एक समय पर लालू यादव के खास माने जाने वाले नितीश कुमार 1995 के बाद एनडीए से जुड़ गए। कई वर्षों बाद जब इनके लाख विरोध के बावजूद नरेंद्र मोदी को एनडीए का प्रधानमंत्री उम्मीदवार बनाया गया, तो उन्होंने एनडीए से संबंध तोड़ते हुए राजद से एक बार फिर अपने संबंध मजबूत किए। वर्ष 2015 में दोनों पार्टियों ने साथ मिलकर चुनाव लड़ा और BJP को हराया लेकिन वर्ष 2017 में नीतीश पलटी मारते हुए BJP के साथ आ गए और BJP की सहायता से दोबारा CM बने। अब लगता है कि इस साल वे दोबारा NDA से बाहर पलटी मार सकते हैं। इससे उनकी बची कुची छवि का मिट्टी में मिल जाना निश्चित है। ‘ऐसा कोई सगा नहीं, जिसे नीतीश ने ठगा नहीं’ का नारा जिस नेता के लिए इस्तेमाल किया जाता हो, उस व्यक्ति की विश्वसनीयता को आप समझ सकते हैं। अगर नीतीश कुमार अब दोबारा NDA छोड़कर RJD के साथ जाते हैं तो उनके चेहरे की कोई विश्वसनीयता नहीं रह जाएगी।

विश्वसनीयता न रहने का मतलब होगा कि लोग उनका चेहरा देखकर उन्हें वोट नहीं करेंगे और RJD के पास तो लोगों को दिखाने के लिए कोई चेहरा है ही नहीं। तेजप्रताप और तेजस्वी को देखकर तो शायद ही पार्टी को कोई वोट दे। ऐसी स्थिति में सबसे बड़ा फायदा BJP को ही पहुंचेगा। नीतीश कुमार अगर RJD के साथ नज़दीकियाँ बढ़ाकर एक बार फिर पलटी मारने की योजना बना रहे हैं तो महत्वहीन हो चुकी RJD की तरह ही बिहार की जनता JDU को भी सत्ता से बाहर का रास्ता दिखा देगी और इसमें BJP को ही सबसे बड़ा फायदा होगा।

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