उत्तर प्रदेश

अखिलेश ने चली सबसे बड़ी चाल, इन शहरी सीटों पर ऐसे करेंगे कमाल

उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा गठबंधन हो जाने के बाद से सभी की उत्सुकता यह जानने मे थी कि कौन सी सीट किस पार्टी के खाते मे आती है.सभी कयासो पर विराम लगाते हुए गुरुवार को 75 सीटों के बंटवारे का ऐलान भी कर दिया गया.इसके अनुसार बसपा 38 तो सपा 37 सीटों पर चुनाव लड़ेगी. जबकि तीन सीटें आरएलडी के लिए छोड़ी गई हैं. सपा के खाते में जहां ज्यादातर शहरी सीटें आईं है तो वहीं ग्रामीण इलाकों की सीटें बसपा के खाते में गई है.

सपा-बसपा गठबंधन ने ऐलान किया था कि राज्य की 80 लोकसभा सीटों में से 38-38 सीटों पर दोनों पार्टियां चुनाव लड़ेंगी. इसके अलावा दो सीटें आरएलडी के लिए छोड़ी थी. जबकि अमेठी और रायबरेली में कांग्रेस के खिलाफ उम्मीदवार नहीं उतारने का फैसला किया था. हालांकि बाद में अखिलेश यादव ने अपने कोटे से एक अन्य सीट आरएलडी को दे दी थी. आपको बता दें कि उत्तर प्रदेश की 80 लोकसभा सीटों में से 12 सीटें शहरी इलाके में आती हैं, इनमें से 9 पर सपा और 3 सीटों पर बसपा चुनाव लड़ेंगी. लखनऊ, मुरादाबाद, कानपुर, गाजियाबाद, वाराणसी, बरेली, इलाहाबाद, गोरखपुर और झांसी जैसी शहरी सीटें सपा को , जबकि मेरठ, आगरा और गौतमबुद्धनगर (नोएडा) सीट बसपा के हिस्से मे आयी है.

दिलचस्प बात ये है कि बरेली, लखनऊ, वाराणसी, गाजियाबाद और कानपुर से सपा कभी जीत हासिल नहीं कर पायी हैं. गोरखपुर और झांसी सीट भी सपा को एक ही बार जीत मिल सकी है. मुरादाबाद और इलाहाबाद की सीट पर सपा का अपना आधार रहा है. मुरादाबाद में सपा के शफीकुर्रहमान बर्क तीन बार जीत हासिल कर चुके हैं.जबकि इलाहाबाद सीट पर सपा से रेवती रमण सिंह दो बार जीत हासिल कर चुके हैं. लेकिन इन दोनों सीटों पर इन दोनों नेताओं के अलावा सपा का कोई नेता जीत नहीं सका है.

जानकारो का मानना है कि गठबंधन में सपा को शहरी सीटों को लेने से बचना चाहिए था, क्योंकि पार्टी का आधार ग्रामीण इलाकों वाली सीटों पर है.गठबंधन में सपा से बड़ी चूक हो गई है,जबकि मायावती ने गठबंधन में ऐसी सीटें ली हैं, जो ग्रामीण इलाके की हैं. बसपा शहरी सीटें भी वही ली हैं, जहां वो पहली चुनाव जीत चुकी है. आगरा, मेरठ और नोएडा तीनों सीटों पर पहले भी बसपा के सांसद रह चुके हैं.

उल्लेखनीय है कि उत्तर प्रदेश में सपा और बसपा दोनों लम्बे समय तक विरोधी पार्टी रहे हैं लेकिन इस बार दोनों पार्टियाँ मिल कर चुनाव लड़ रही हैं. उत्तर प्रदेश की सियासत में अहम् रोल अदा करने वाली ये पार्टियाँ उम्मीद कर रही हैं कि आने वाले लोकसभा चुनाव में इन्हें इस महागठबंधन का लाभ मिलेगा. सपा-बसपा के कार्यकर्ता भी इस गठबंधन से ख़ुश नज़र आ रहे हैं. दूसरी ओर भाजपा के लिए ये महागठबंधन एक झटके की तरह है. भाजपा को अब अपनी ओर से कहीं अधिक मेहनत करने की ज़रूरत है. बहरहाल चुनाव में कौन जीतता है और कौन हारता है ये देखने की बात होगी लेकिन ये बात तय है कि मुक़ाबला दिलचस्प होगा.

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